साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और अमर उजाला शब्द सम्मान के सर्वोच्च अलंकरण ‘आकाशदीप’ से सम्मानित नायर एमटी के नाम से लोकप्रिय रहे। उनका जाना, मलयालम साहित्य, संस्कृति और फिल्म जगत के लिए आघात है। उन्होंने मलयालम सिनेमा पर भी अमिट छाप छोड़ी।
ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और अमर उजाला शब्द सम्मान के श्रेष्ठ अलंकरण ‘आकाशदीप’ से सम्मानित मलयालम के मशहूर साहित्यकार और फिल्मकार एमटी वासुदेवन नायर नहीं रहे। उनका जाना, मलयालम साहित्य, संस्कृति और फिल्म के लिए एक आघात है।
विज्ञापन
एक साहित्यकार के बनने में कितने वर्ष लगते हैं? क्या इस प्रश्न का कोई अर्थ है? कई बार नहीं और कई बार हां! जब एमटी जैसा साहित्यकार साथ छोड़ जाए तो ऐसे सवाल सामने आ ही जाते हैं। मैं तो कहूंगी एमटी जैसा साहित्यकार बनने और उनके जैसी दृष्टि पाने और फिल्मकार बनने के लिए 91 साल लग जाते हैं। मैंने एमटी के ढेर सारे रूप देखे हैं। 50 वर्षों से ज्यादा का साथ रहा। एक लेखक और फिल्मकार के अलावा वे साहित्यकारों के लिए लड़ने वाले एक योद्धा थे। वे लंबे समय तक ‘एकेडेमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर’ के वाइस प्रेसीडेंट रहे, जिसकी मैं फांउडर प्रेसीडेंट हूं।
वह साहित्य अकादमी के काम के लिए अक्सर दिल्ली आते रहते थे। मैं केरल जाती थी। हमारी आपस में बहुत बनती थी। उन्होंने एक बार साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव भी लड़ा था। हालांकि जीत नहीं हुई, लेकिन वह तो लोगों के दिलों में जीने वाले इन्सान थे। उनका उपन्यास ‘वाराणसी’ जिन्होंने पढ़ा है, वे समझ सकते हैं कि लोगों और जिंदगी को देखने का उनका नजरिया कितना पारदर्शी था।
विज्ञापन
आज उनकी एक कहानी मुझे बार-बार याद आ रही है-‘अंधेरे की आत्मा’। इस कहानी में जिंदगी की भावनात्मक यात्रा कराते हैं वह। उनकी साहित्यिक यात्रा से अलग उनके एक अन्य काम ने मुझे बहुत प्रभावित किया। वह था 18वीं सदी के कवि थुंचन रामानुजन एजुथाचन के स्मारक निर्माण में उनका योगदान। उनकी लिखी किताब ‘रामायणम किलिप्पट्टू’ व ‘भागवतम किलिप्पट्टू’ के महत्व को एमटी समझते थे। केरल सरकार ने फैसला किया कि कवि थुंचन का एक स्मारक बनना चाहिए। सरकार ने इसके लिए 7-8 एकड़ से अधिक जमीन दी। इसका चीफ एडवाइजर बनाया गया एमटी नायर को। जमीन के चारों तरफ दीवार बनाने लगी, जिसका निरीक्षण एमटी करने जाते। उसके बाद सरकार बदल गई। काम रुक गया। एमटी को यह बात परेशान करने लगी।
खुद की तारीफ नहीं थी पसंद
जब कवि थुंचन का स्मारक बन गया तो एमटी ने उसका उद्घाटन करने के लिए दो लोगों को बुलाया। एक मराठी के कवि थे- दिलीप चित्रे और मुझे। स्मारक का उद्घाटन हुआ, बहुत बड़े-बड़े लोग आए हुए थे। एमटी ने मेमोरियल में 10 बड़े-बड़े कमरे भी बनवाए, ताकि लेखक वहां आकर रह सकें व अच्छी तरह ध्यान लगाकर लिख सकें। लेकिन मैं उनके इस योगदान का जब भी लोगों के सामने जिक्र करती, वह मना कर देते। वह कहते थे, “मेरी बड़ाई में ये सब न करो।” उन्हें खुद की तारीफ पसंद नहीं थी। अब एमटी मेरे लिए एक ‘याद’ बन गए हैं। यकीन नहीं होता। लगता है, कानों में उनकी वही आवाज गूंज रही हो, “हम लोग मीठे में क्या खाएंगे?” इस मीठी याद में उनके लिए मेरी प्रार्थना भी शामिल है।
प्रमुख सम्मान एवं पुरस्कार : ज्ञानपीठ के अलावा, पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी फेलोशिप, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी फेलोशिप।
ये सम्मान भी मिले
1995 : नायर को सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया था।
2013 : मलयालम सिनेमा में आजीवन उपलब्धि के लिए जेसी डेनियल सम्मान।
2022 : केरल सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान केरल ज्योति पुरस्कार मिला।