पटेल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुके हैं और पिछड़े वर्ग से आते हैं। इसलिए भाजपा समर्थक पिछड़े वर्गों में भी वह शिवराज का एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं, जो केंद्रीय नेताओं के मुफीद भी हो सकता है।
भाजपा सूत्रों का कहना है कि यूं तो भाजपा विधायकों में अभी भी सबसे ज्यादा समर्थक शिवराज सिंह चौहान के हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व और संघ के शीर्ष स्तर पर यह राय बन रही है कि शिवराज सिंह चौहान तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अब राज्य में नए नेतृत्व को विकसित करने की जरूरत है, क्योंकि भाजपा 2018 का विधानसभा चुनाव शिवराज के नेतृत्व में लड़कर कांग्रेस से पिछड़ चुकी है।
इसलिए अब किसी नए चेहरे को आगे लाना चाहिए और शिवराज सिंह चौहान के अनुभव और योग्यता का लाभ पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहिए। वैसे भी संघ नेतृत्व में शिवराज सिंह चौहान के संरक्षक माने जाने वाले सुरेश सोनी सेहत की वजह से उतने प्रभावशाली नहीं रह गए हैं जैसे वह पहले थे।
शिवराज के विकल्प के रूप में नरेंद्र सिंह तोमर या नरोत्तम मिश्रा के नाम ज्यादा चर्चित हैं।लेकिन ये दोनों ही उसी ग्वालियर चंबल संभाग से आते हैं जो ज्यातिरादित्य सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र है, लेकिन सिंधिया जिनकी बगावत से कांग्रेस सरकार गिरी है और भाजपा को फिर सरकार बनाने का मौका मिला है, वो नहीं चाहते कि उनके प्रभाव क्षेत्र में कोई दूसरा सत्ता केंद्र बने।
इसलिए उनका दबाव है कि भाजपा जिसे भी सूबे की कमान सौंपे वो ग्वालियर चंबल संभाग से बाहर का हो। फिर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा भी इसी क्षेत्र से हैं ऐसे में अगर तोमर या मिश्रा को मुख्यमंत्री बनाया गया तो राज्य सरकार का पूरा सत्ता केंद्र ग्वालियर चंबल संभाग में ही सिमट जाएगा। इसके अलावा नरोत्तम मिश्रा के रास्ते की दो बड़ी बाधाएं और हैं।
एक अतीत में उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और दूसरा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर कुछ महीने पहले ही एक ब्राह्मण वीडी शर्मा की नियुक्ति। जबकि नरेंद्र सिंह तोमर को लेकर भाजपा और संघ की बड़ी उलझन है कि तोमरी की योग्यता, क्षमता और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा में कोई कमी न होने के बावजूद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकारों के मुख्यमंत्री तोमर के सजातीय यानी क्षत्रिय हैं और एसे में मध्य प्रदेश में भी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी अऩ्य सामाजिक वर्गों के साथ संतुलन बिगाड़ना नहीं चाहती।
साथ ही अगर शिवराज सिंह चौहान की जगह किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री बनाया गया तो भाजपा के पिछड़े वर्गों के जनाधार के नाराज होने का भी जोखिम है और राज्य में 25 सीटों पर उपचुनाव होंगे, जिनमें ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना भाजपा सरकार की स्थिरता के लिए बेहद जरूरी होगा। इस लिहाज से भी प्रह्लाद पटेल पर केंद्रीय नेतृत्व की नजरें टिकी हैं।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक इन सारे तथ्यों और तर्कों को ध्यान में रखते हुए भाजपा नेतृत्व के सामने या तो शिवराज सिंह चौहान को फिर से कुर्सी सौंपने की मजबूरी या फिर उनका बेहतर विकल्प तलाशने की गहरी चुनौती है। जहां तक शिवराज सिंह चौहान को फिर से मुख्यमंत्री बनाने की बात है तो न तो राज्य के ज्यादातर दिग्गज नेता नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय, गोपाल भार्गव, वीडी शर्मा इसे पचा पा रहे हैं और न ही भाजपा के कई केंद्रीय नेता इससे सहमत हैं।
ज्यादातर की राय है कि शिवराज सिंह चौहान को अब राज्य से बाहर केंद्र में लाया जाए। जबकि शिवराज सिंह चौहान विधानसभा चुनावों के बाद से ही राज्य में ही जमे रहना चाहते हैं, इसीलिए भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बावजूद उन्होंने भोपाल नहीं छोड़ा और सिंधिया की बगावत के बाद वह खुद मोर्चे पर सामने आ गए।
उन्होंने बागी विधायकों के भोपाल छोड़ने के बाद हुए हर सियासी घटनाक्रम में भाजपा की अगुवाई की और जब कमलनाथ ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने उसी रात अपने आवास पर भाजपा विधायकों के लिए रात्रि भोज के लिए न्यौता भी दे दिया। लेकिन इसकी शिकायत जब भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा तक पहुंची तो उन्होंने तत्काल शिवराज सिंह को फोन करके उसे रुकवा दिया।
मजबूरी में शिवराज सिंह चौहान ने कोरोना संक्रमण का बहाना लेकर रात्रि भोज टाल दिया जबकि कोरोना संकट को लेकर पहले से ही देश में सामूहिक आयोजनों पर रोक है। बताया जाता है कि इन्हीं सारी परिस्थितियों के मद्देनजर केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल और थावरचंद गहलोत का नाम उभर कर आया है और नेतृत्व में गहन मंथन जारी है।