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MP Election: विंध्य-बुंदेलखंड-चंबल में जीत के लिए BSP ने की तैयारी; मायावती क्यों भतीजे आकाश पर जता रही भरोसा?

सार

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले दम पर किस्मत आजमा रही है। पार्टी को जिताने का जिम्मा आकाश आनंद और राज्यसभा सांसद रामजी गौतम के कंधों पर है। मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने दलित और आदिवासी उत्पीड़न को लेकर लगातार मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार को घेर रहे है। मध्य प्रदेश में 17 फीसदी के करीब दलित वोटर हैं। बसपा का सियासी आधार इन्हीं वोटों पर टिका है।
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Mayawati - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने भी तैयारियां शुरु कर दी है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश से सटे हुए जिलों के उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही भाजपा के खिलाफ हल्ला बोल शुरु कर दिया है। मायावती के सियासी वारिस माने जाने वाले आकाश आनंद प्रदेश की सड़कों पर संघर्ष करते हुए और चुनावी रणनीति बनाते हुए दिख रहे हैं। बसपा चुनाव से पहले प्रदेश में बड़ी सभा करने की तैयारी में है। सितंबर में प्रस्तावित इस सभा को पार्टी सुप्रीमो मायावती संबोधित करेंगी। इसके लिए स्थान और दिन निर्धारित किया जा रहा है। इसके पहले पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद की भी सितंबर में भोपाल में सभा हो सकती है।

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इस बार आकाश के जिम्मे है मध्य प्रदेश
बसपा मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले दम पर किस्मत आजमा रही है। पार्टी को जिताने का जिम्मा आकाश आनंद और राज्यसभा सांसद रामजी गौतम के कंधों पर है। मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने दलित और आदिवासी उत्पीड़न को लेकर लगातार मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार को घेर रहे है। आकाश की सहमति के बाद ही पिछले दिनों रीवा और सतना के तीन बड़े नेताओं ने बसपा का दामन थामा है। चुनाव से पहले पार्टी के लिए यह बड़ी उपलब्धि है। इससे विंध्य क्षेत्र में पार्टी की ताकत बढ़ेगी। बहुजन समाज पार्टी की नजर मध्य प्रदेश चुनाव में दलित और आदिवासी समुदाय के वोटों पर है। इनकी आबादी 40 फीसदी के करीब है। बसपा इन्हीं 40 फीसदी वोटों को अपने पाले में लाकर मध्य प्रदेश की राजनीति में किंगमेकर बनने का सपना संजोये हुए है। इसलिए आकाश खुद जमीन पर उतरकर दलित और आदिवासियों को साधने में जुटे हुए है।

मध्य प्रदेश में 17 फीसदी के करीब दलित वोटर हैं। बसपा का सियासी आधार इन्हीं वोटों पर टिका है। उत्तर प्रदेश से सटे हुए मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड, विंध्य, ग्वालियर-चंबल इलाके की सीटों पर मायावती प्रभाव डालती रही हैं। प्रदेश की 25 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर बसपा हार-जीत तय करती है। बुंदेलखंड व ग्वालियर इलाके में बड़ी आबादी दलित समुदाय की है, जहां पर कुछ सीटों पर बसपा चुनाव जीतती रही है। बसपा इन्हीं इलाकों की सीटों पर 2023 के चुनाव में फोकस कर रही है और इतनी सीटें जीतने की जुगत में है, ताकि उसके बिना कांग्रेस या बीजेपी किसी की भी सरकार न बन सके।
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प्रदेश में कमजोर और दिशाहीन नेतृत्व
मध्यप्रदेश में बसपा के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण मजबूत नेतृत्व का अभाव है। दूसरे दलों से आए नेताओं की लोकप्रियता का फायदा उठाकर पार्टी विधानसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने में सफल रही, लेकिन उन्हें अपने साथ बनाए रखने में नाकामयाब रही। फायदा देखकर ये विधायक दूसरी पार्टियों में शामिल हो गए। पार्टी नेतृत्व की भी इसमें अहम भूमिका रही। चुनाव जीतने के बाद बीजेपी और कांग्रेस से अलग रहने की बजाय पार्टी नेतृत्व उन्हीं को अपना समर्थन देता रहा। इसके चलते बसपा एमपी में कभी अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना पाई।

2023 के लिए यह रणनीति अपना रही बसपा
बहुजन समाज पार्टी के मध्यप्रदेश के एक पदाधिकारी अमर उजाला से चर्चा में कहते है, 2022 में यूपी में मिली हार के बाद बसपा नेतृत्व मध्य प्रदेश में पहले के मुकाबले थोड़ा एक्टिव नजर आ रहा है। पहली बार स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी ने बड़ी संख्या में अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन पाटर्भ् को ज्यादा कामयाबी नहीं मिले। विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ग्वालियर, चंबल, विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र में ताकत बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। जिला और विधानसभा स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलनों की शुरुआत हो गई है। निष्क्रिय पड़े संगठन में जान फूंकने के लिए नए पदाधिकारी नियुक्त किए गए। 2023 के विधानसभा चुनावों के लिए बसपा की एक ही रणनीति है कि किसी भी दल की सरकार उसके समर्थन के बिना नहीं बने। फिलहाल हम भाजपा—कांग्रेस के ऐसे नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने में करने लगे हुए जो अपनी पार्टियों से असंतुष्ट चल रहे हैं।

उम्मीदवार चयन के लिए मायावती ने दिए ये टिप्स
चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों के क्रम में हाल ही में मध्य प्रदेश के पदाधिकारियों के साथ बैठक की थी। बैठक में मायावती ने पदाधिकारियों को कर्मठ व ईमानदार उम्मीदवारों के चयन का निर्देश दिया था। मायावती ने कहा, कई राज्यों में शक्ति का संतुलन बनने के बावजूद जातिवादी तत्वों द्वारा साम, दाम, दंड, भेद के हथकंडे अपनाकर बसपा विधायकों को तोड़ लिया जाता है। जिससे जनता के साथ विश्वासघात कर घोर स्वार्थी लोग सत्ता पर काबिज हो जाते हैं। इसलिए आगे इन विधानसभा चुनाव में बैलेंस ऑफ पावर बनने पर लोगों की चाहत के हिसाब से सरकार में शामिल होने पर विचार किया जाएगा।

मायावती ने चारों राज्यों का जिक्र करते हुए कहा था कि इन राज्यों में धार्मिक अल्पसंख्यकों व मुस्लिम समाज का भला तभी हो सकता है जब मजबूत व अहंकारी सरकार नहीं बल्कि गठबंधन की मजबूर सरकार होगी। इस समाज के लोगों पर अत्याचार की खबरें लगातार आती हैं। यह दुखद है। इसका समाधान तभी होगा जब सरकार में उनके हितैषी प्रतिनिधि होंगे। मायावती ने सरकार से बाढ़ पीड़ितों की भी मदद करने की अपील की। कहा, पार्टी के लोगों को जो भी संभव हो मदद करनी चाहिए।

1993 के बाद लगातार गिर रहा है बसपा का ग्राफ
बसपा के 1993 में 11 विधायक जीतकर आए थे। 1998 में भी 11 विधायक जीतने में सफल रहे थे, लेकिन इसके बाद से बसपा का सियासी ग्राफ गिरता चले गया। 2003 में बसपा के दो विधायक जीते थे। लेकिन जब उत्तर प्रदेश के 2007 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई तो इसका असर मध्यप्रदेश में भी नजर आया। 2008 के विधानसभा चुनाव में बसपा के सात विधायक चुनकर आए थे। लेकिन जैसे जैसे यूपी में बसपा का ग्राफ गिरता गया तो मध्यप्रदेश में इसका असर दिखा। 2013 के मध्य प्रदेश चुनाव में बसपा के चार विधायक जीते। 2018 में दो विधायक बने। इनमें से भी एक संजीव कुशवाहा बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। इतना ही नहीं, बसपा के वोट फीसदी में भी गिरावट भी आई है। 2018 में बसपा को करीब 5 फीसदी ही वोट मिले।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में करीब 22 फीसदी आदिवासी समुदाय है। 17 फीसदी दलित आबादी है। राज्य के विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं, इनमें से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति और 35 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इस तरह 82 सीटें एससी-एसटी के लिए आरक्षित हैं जबकि 148 सीटें अनारक्षित हैं। 

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