भाजपा
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साल के अंत में मध्य प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इसे लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसी सिलसिले में गुरुवार को विधानसभा चुनाव के लिए कुल 39 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी।
भाजपा का यह कदम पार्टी की पुरानी चुनावी रणनीति के लिहाज से काफी चौंकाने वाला था। अमूमन पार्टी चुनाव तारीखों की घोषणा के बाद ही प्रत्याशियों के नाम जारी करती रही है। इस बीच हम बता रहे हैं कि सभी 39 सीटों पर बीते तीन चुनावों के नतीजे कैसे रहे हैं...
भाजपा सीईसी की बैठक।
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पहले जानते हैं 2018 में क्या हुआ था?
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के 39 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी गई। राज्य की इन 39 सीटों में से 38 पर भाजपा को 2018 में हार मिली थी। वहीं, झाबुआ सीट पर 2018 में पार्टी को जीत जरूर मिली थी। लेकिन, बाद में हुए उपचुनाव में यहां से कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया विधायक बने थे।
2013 चुनाव में क्या थे इन सीटों पर नतीजे?
2013 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी इन 39 सीटों में से 28 पर भाजपा के उम्मीदवार विजयी हुए थे। वहीं राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को 11 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल हुई थी।
भाजपा ने 60 नामों की सूची जारी की।
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2008 चुनाव में किसके पक्ष में थे इन सीटों के परिणाम?
2008 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी इन 39 सीटों के नतीजे लगभग बराबरी पर थे। 39 में से 18 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के उम्मीदवार जीतकर आए थे। जबकि कांग्रेस को 20 विधानसभा सीटों में जीत मिली थी। एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार को विजय मिली थी। छतरपुर जिले की महाराजपुर सीट पर निर्दलीय भंवर राजा मानवेंद्र सिंह जीते थे। 2013 में मानवेंद्र सिंह भाजपा के टिकट पर फिर से जीते। हालांकि, 2018 में उन्हें यहां से हार का सामना करना पड़ा। राजपरिवार से आने वाले मानवेंद्र सिंह की जगह भाजपा ने इस बार यहां से उनके बेटे कामाख्या प्रसाद सिंह को टिकट दिया है।
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किन सीटों पर बीते तीनों चुनाव हारी है भाजपा?
इन 39 में से भोपाल उत्तर, कुक्षी और पिछोर ऐसे तीन सीटें हैं जहां भाजपा लगातार तीनों चुनाव हारी है। राजधानी भोपाल की भोपाल उत्तर सीट की बात करें तो यहां से भाजपा ने पूर्व मेयर आलोक शर्मा को उतारा गया है। इस सीट से कांग्रेस के आरिफ अकील लगातार जीतते रहे हैं। लगातार सात बार यहां से जीत चुके अकील इस बार अपने परिवार के लिए कांग्रेस से टिकट मांग रहे हैं। अकील अपने मझले बेटे को यहां से टिकट दिलाना चाहते हैं। हालांकि, उनके परिवार में ही टिकट को लेकर रस्साकस्सी हो रही है। अकील के भाई और उनके बड़े बेटे भी इस सीट पर दावेदारी पेश कर रहे हैं।
शिवपुरी जिले की पिछोर सीट पर भाजपा ने प्रीतम लोधी को टिकट दिया है। दिलचस्प बात यह है कि ब्राह्मणों और कथावाचकों पर टिप्पणी करने को लेकर प्रीतम लोधी को पार्टी से निकाल दिया गया था। उमा भारती के करीबी लोधी की वापसी कुछ ही महीने पहले भाजपा में हुई है। 2018 में लोधी इसी सीट पर भाजपा के टिकट से चुनाव लड़े थे और 2675 वोट से हार गए थे। पिछोर से कांग्रेस के केपी सिंह 1993 से लगातार छह बार जीत चुके हैं।
इसी तरह कुक्षी सीट पर भाजपा को आखिरी बार 1990 में जीत मिली थी। तब पूर्व मंत्री रंजना बघेल यहां से जीती थीं। पार्टी ने इस बार रंजना बघेल के भतीजे जयदीप पटेल के उम्मीदवार बनाया है। पिछला चुनाव कांग्रेस ने यहां करीब 63 हजार वोट से जीता था।
तीन में से दो चुनाव किन सीटों पर जीते?
10 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां पिछले तीन चुनावों में से दो में जीत मिली है ओर एक बार यहां हार का सामना करना पड़ा है। ये सीटें हैं छतरपुर, पथरिया, गुन्नौर, बड़वारा, बरगी, बरघाट, सौंसर, भोपाल मध्य, अलीराजपुर ओर तराना विधानसभा सीटें हैं। जहां पार्टी को 2018 से पहले के दोनों चुनाव में जीत मिली थी।
भाजपा (सांकेतिक तस्वीर)।
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तीन में से एक ही चुनाव में कहां मिली जीत?
17 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां पिछले तीन चुनावों में से एक में ही जीत मिली है और दो बार यहां हार का सामना करना पड़ा है। ये सीटें हैं सबलगढ़, सुमावली, गोहद, चचौरा, बांदा, महाराजपुर, जबलपुर पूर्व, शाहपुरा, बिछिया, गोटेगांव, मुलताई, भैंसदेही, सोनकच्छ, महेश्वर, पेटलावद, धरमपुरी ओर घाटिया।