सांसदों और विधायकों की संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह सवाल उठाया है कि क्या जनप्रतिनिधि होते हुए सांसद और विधायक अपना व्यवसाय कर सकते हैं? शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया है कि दागी नेताओं के खिलाफ जांच और ट्रायल जल्द खत्म होना चाहिए।
कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई कि भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन क्यों नहीं किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अगर सांसद और विधायक यह बता भी देते हैं कि उनकी संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि उनके अपने व्यवसाय के कारण हुई है, तो यह सवाल उठता है कि क्या जनप्रतिनिधि होने के नाते सांसद व विधायक साथ-साथ अपना व्यवसाय भी कर सकते हैं?
पीठ ने यह सवाल लोक प्रहरी नामक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया। याचिका में गुहार लगाई गई है कि चुनाव में पर्चा दाखिल करते वक्त उम्मीदवारों को न केवल खुद की बल्कि परिवार के सभी सदस्यों की आमदनी का स्रोत बताना जरूरी किया जाए।
पीठ ने यह कहते हुए इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि अब समय आ गया है जब मतदाताओं को प्रत्याशियों के बारे में संपूर्ण जानकारी देनी चाहिए। चुनाव में पारदर्शिता को अहम बताते हुए कहा कि आखिर उम्मीवारों को अपने बारे में जानकारी क्यों छिपानी चाहिए?
जनप्रतिनिधि की वैध आय के सभी स्रोतों के बारे में जानकारी हासिल करना काफी नहीं है। इसकी भी जांच होनी चाहिए कि उस जनप्रतिनिधि ने इतनी बेशुमार दौलत कैसे कमाई।
वहीं सुनवाई केदौरान पीठ ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के उस हलफनामे पर भी गौर किया जिसमें उन सांसदों एवं विधायकों का ब्यौरा दिया गया है जिनके चुनावी हलफनामे और आयकर रिटर्न में काफी अंतर पाया गया है।
हलफनामे में कहा गया है कि सात लोकसभा सांसदों और 98 विधायकों की संपत्तियों में खासी वृद्धि का पता चला है और इसकी जांच की जा रही है। इन इन सभी द्वारा चुनावी हलफनामे में संपत्तियों के बारे में दी गई जानकारी आयकर रिटर्न में दी गई जानकारी से अलग है।
सीबीडीटी ने सीलबंद लिफाफे में इन सांसदों व विधायकों ने नाम भी दिए हैं। पीठ ने मंगलवार को सीलबंद लिफाफे को खोला और लेकिन नाम सार्वजनिक नहीं किए। पीठ ने कोर्ट मास्टर को फिर से इस जानकारी को सीलबंद करने का निर्देश दिया।