नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने हिमाचल प्रदेश में विकास के चलते लगातार हो रहे पर्यावरणीय विनाश पर चिंता और कड़ी नाराजगी जाहिर की है। पीठ ने कहा है कि पहाड़ों को सीमेंट के जंगल में तब्दील करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। लगातार बढ़ रही आबादी का बोझ और अंधाधुंध निर्माण न सिर्फ पर्यावरण को क्षति पहुंचा रहे हैं बल्कि एक बड़ी आपदा को भी दावत दे रहे हैं। सोच-समझ कर विकास होना चाहिए।
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इसलिए सरकार तीन महीनों के भीतर शिमला के लिए डेवलपमेंट प्लान तैयार करे। वहीं एनजीटी ने हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के भवन विस्तार को भी हरित क्षेत्र में निर्माण करने से रोक दिया है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग ने जगह की कमी के चलते नई आधुनिक लाइब्रेरी, बच्चों के लिए सुविधा केंद्र, साक्षात्कार कक्ष, पार्किंग के लिए अतिरिक्त निर्माण की मांग की थी।
आवेदक की आपत्ति थी कि जहां निर्माण किया जाना है वह क्षेत्र हरित या जंगल क्षेत्र है। इसकी तस्वीरें भी ट्रिब्यूनल के समक्ष सबूत के तौर पर पेश की गईं थीं। पीठ ने याची की आपत्ति व अन्य तथ्यों को आधार बनाते हुए कहा कि ऐसी एक भी वजह नहीं है कि निर्माण की अनुमति दी जाए। यहां तक कि तमाम सरकारी कार्यालय हरित क्षेत्र या जंगलों को ही अपना ठिकाना बना रहे हैं।