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दुनिया में डॉक्टरों की संख्या बढ़ी: फिर भी इलाज का संकट क्यों गहरा रहा? डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ने बताई बड़ी वजह

Sat, 19 Sep 2026 08:50 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल अमर उजाला नेटवर्क

सार

दुनिया में डॉक्टर, नर्स और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। फिर भी गरीब देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी और अमीर देशों में बढ़ती उम्र बड़ी चुनौती बन रही है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 2030 तक दुनिया में 1.11 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी हो सकती है। ऐसे में सवाल है कि संख्या बढ़ने के बावजूद इलाज की सुविधा सभी तक समान रूप से क्यों नहीं पहुंच पा रही है?
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डॉक्टर बढ़े फिर भी इलाज का संकट क्यों? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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दुनिया में डॉक्टर, नर्स और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी है, लेकिन इससे हर देश के नागरिक को समान स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना सुनिश्चित नहीं हुआ है। इसके उलट स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी हो रही है।एक तरफ गरीब देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है, तो दूसरी तरफ कई समृद्ध देशों में बड़ी संख्या में डॉक्टर सेवानिवृत्ति की उम्र के करीब पहुंच चुके हैं।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नई रिपोर्ट नेशनल हेल्थ वर्कफोर्स एकाउंट्स: हेल्थ वर्कफोर्स लेवल्स एंड ट्रेंड्स 2026 में वैश्विक स्वास्थ्यकर्मियों की स्थिति का विस्तृत आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में स्वास्थ्य और देखभाल क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या 7 करोड़ से अधिक हो गई है। पिछले करीब 20 वर्षों में प्रति आबादी स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता में भी 52% की वृद्धि हुई है।लेकिन इस बढ़ोतरी की तस्वीर दुनिया के हर हिस्से में एक जैसी नहीं है।

20 साल में स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता बढ़ी

रिपोर्ट के अनुसार 2006 में दुनिया में प्रति 10 हजार आबादी पर औसतन 44.8 स्वास्थ्यकर्मी थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 67.9 हो गई। इस गणना में डॉक्टर, नर्स, दाई, दंत चिकित्सक और फार्मासिस्ट जैसे स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हैं।इससे पता चलता है कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था ने पिछले दो दशकों में मानव संसाधन के स्तर पर विस्तार किया है। हालांकि केवल संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्यकर्मी किस देश में हैं, उनकी विशेषज्ञता क्या है और जरूरतमंद आबादी तक उनकी पहुंच कितनी है ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।यही अंतर डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में सबसे स्पष्ट रूप से सामने आता है।

यूरोप और अफ्रीका के बीच बड़ा अंतर

स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता में दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के बीच भारी असमानता बनी हुई है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार यूरोपीय क्षेत्र में डॉक्टरों का घनत्व अफ्रीकी क्षेत्र की तुलना में करीब 13 गुना अधिक है।नर्सों और दाइयों के मामले में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। यूरोप में इनकी उपलब्धता अफ्रीकी क्षेत्र की तुलना में करीब 6 गुना अधिक है।इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच पर पड़ता है। जिन देशों में डॉक्टर और नर्स कम हैं, वहां अस्पतालों पर दबाव बढ़ता है, मरीजों को विशेषज्ञ उपचार के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है और ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं और कमजोर हो सकती हैं।डब्ल्यूएचओ के मुताबिक स्वास्थ्यकर्मियों का घनत्व किसी देश की आर्थिक स्थिति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यानी जिन देशों के पास स्वास्थ्य शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, वहां स्वास्थ्यकर्मियों की कमी दूर करना अधिक कठिन है।

अब एक और चुनौती: डॉक्टर हो रहे हैं बूढ़े

रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में स्वास्थ्यकर्मियों की उम्र बढ़ना भी शामिल है। दुनिया के करीब हर चार में से एक डॉक्टर की उम्र 55 वर्ष से अधिक है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ये सभी डॉक्टर तुरंत सेवानिवृत्त होने वाले हैं, लेकिन अगले वर्षों में बड़ी संख्या में अनुभवी डॉक्टर कार्यबल से बाहर हो सकते हैं।उच्च आय वाले देशों में स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है। वहां करीब हर तीन में से एक डॉक्टर 55 वर्ष से अधिक उम्र का है।यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया की आबादी भी तेजी से उम्रदराज हो रही है। बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और लंबे समय तक उपचार की जरूरत वाली दूसरी बीमारियों के मामलों में स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ सकती है। ऐसे में अनुभवी डॉक्टरों के सेवानिवृत्त होने और उनकी जगह पर्याप्त संख्या में नए स्वास्थ्यकर्मियों के तैयार न होने के बीच अंतर स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

2030 तक 1.11 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का अनुमान

  • डब्ल्यूएचओ ने भविष्य को लेकर भी चेतावनी दी है। मौजूदा रुझानों के आधार पर 2030 तक दुनिया में करीब 1.11 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी हो सकती है।रिपोर्ट के अनुसार 67 देशों के सामने अपनी आबादी की बुनियादी स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त डॉक्टरों और नर्सों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की चुनौती रह सकती है।
  • इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में केवल मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करने, उन्हें रोजगार देने, ग्रामीण और कम सेवा वाले क्षेत्रों में बनाए रखने तथा बेहतर कामकाजी परिस्थितियां उपलब्ध कराने की भी जरूरत होगी।

आंकड़ों की निगरानी में भी बड़ी प्रगति

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू स्वास्थ्यकर्मियों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2025 में 90% से अधिक सदस्य देशों ने अपने स्वास्थ्यकर्मियों से संबंधित आंकड़े साझा किए।पिछले वर्षों की तुलना में आंकड़ों के संग्रह और उपलब्धता में करीब 20 गुना सुधार हुआ है। इससे देशों के बीच स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता की तुलना करने और भविष्य की जरूरतों का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है।

सिर्फ अस्पताल नहीं, स्वास्थ्यकर्मियों में निवेश जरूरी

डब्ल्यूएचओ का संदेश साफ है कि स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करने का मतलब केवल नए अस्पताल या उपकरण तैयार करना नहीं है। डॉक्टर, नर्स, दाई, तकनीकी कर्मचारी और दूसरे स्वास्थ्य पेशेवर किसी भी स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ हैं।
इसलिए देशों को स्वास्थ्यकर्मियों की शिक्षा, प्रशिक्षण, भर्ती, रोजगार, सुरक्षा और कामकाजी परिस्थितियों में निवेश बढ़ाने की जरूरत होगी।दुनिया के सामने चुनौती अब सिर्फ यह नहीं है कि उसके पास कितने डॉक्टर हैं। बड़ा सवाल यह है कि वे डॉक्टर कहां हैं, उनकी उम्र कितनी है और जिन लोगों को इलाज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां तक स्वास्थ्यकर्मी कितनी आसानी से पहुंच पा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट इसी असमानता और बदलती उम्र संरचना को आने वाले वर्षों की बड़ी स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने रखती है।
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