अंतरिक्ष विशेषज्ञों, भूवैज्ञानिकों और खगोलशास्त्रियों के अनुसार चंद्रमा पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह से कहीं अधिक है, जिसने जीवन की उत्पत्ति से लेकर जलवायु परिवर्तन तक, इसके हर पहलू को प्रभावित किया है। 4.5 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के जन्म के लगभग 175 मिलियन वर्ष बाद एक प्रलयकारी घटना में थिया नामक मंगल के आकार का ग्रह पृथ्वी से टकरा गया। इस घटना से निकला मलबा एकत्रित होकर चंद्रमा के रूप में निर्मित हुआ।
इस घटना ने संभवत: पृथ्वी को बदल दिया
इसके बाद ज्वार आया और शुरू हुआ जीवन
3.2 अरब साल पहले चंद्रमा पृथ्वी से करीब 70 फीसदी नजदीक था। इस निकटता के बाद ज्वार आने लगे जो बेहद मजबूत थे। ऐसा माना जाता है कि उल्कापिंडों और धूमकेतुओं से वितरित कार्बनिक अणुओं की प्रतिक्रिया स्वरूप डीएनए या आरएनए जैसे न्यूक्लिक एसिड बने, इससे जीवन शुरू हुआ।
ज्वार ने ऐसे निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
आकाशीय बहाव से भी पृथ्वी-चंद्रमा को खतरा
चंद्रमा पृथ्वी से प्रति वर्ष 3.8 सेमी दूर जा रहा है, जो लगभग नाखूनों की वृद्धि के बराबर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यह दर जारी रही तो लगभग 15 अरब वर्षों में ग्रह के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से मुक्त होने के बाद पृथ्वी अपना प्राकृतिक उपग्रह खो सकती है, लेकिन लगभग 6 अरब वर्षों में सूर्य का ईंधन खत्म हो जाएगा, इस वजह से वह फूल जाएगा और पृथ्वी तथा चंद्रमा को नष्ट कर देगा।
जलवायु परिवर्तन पर भी पड़ता है असर
चंद्रमा का प्रभाव जलवायु पर भी पड़ता है। जब चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी के भूमध्यरेखा के साथ संरेखित होती है तो उच्च गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ज्वार अधिक मजबूत होते हैं और जब यह भूमध्यरेखा से दूर झुका होता है तो ज्वार कमजोर होते हैं। ज्वार के साथ समुद्र के स्तर में भी उतार-चढ़ाव होता है। नासा का कहना है कि चंद्र नोडल चक्र के आधे हिस्से में दैनिक ज्वार तीव्र होते हैं। वैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं, जीवन के बीजारोपण और आकार देने में चंद्रमा की महत्वपूर्ण भूमिका है। चंद्रमा के बिना हमारा ग्रह बहुत अलग दिखता।
पृथ्वी दो-तीन अरब वर्षों में चंद्रमा के घटते प्रभावों को देखना शुरू कर सकती है। जैस-जैसे पृथ्वी का घूर्णन धीमा होगा, इसकी धुरी अस्थिर हो जाएगी और यह डगमगाने लगेगी। इसके बाद कोई मौसम ही नहीं होगा। यह तबाही की स्थिति होगी। जीवों को उसके अनुकूल ढलने के लिए विकसित होना होगा।