भारत का चंद्रयान-4 मिशन इस दशक के अंत तक चंद्रमा से नमूने वापस लाने के लिए तैयार है। प्रोफेसर सुजय घोष ने कहा कि जब भारत चंद्रमा से चट्टानें वापस लाएगा, तो हमें यह समझना होगा कि वे कहां बनीं और वे चंद्रमा के इतिहास के बारे में क्या बताती हैं। यह शोध मूल्यवान टाइटेनियम युक्त क्षेत्रों की पहचान करने, डेटा का विश्लेषण करने में मदद करेगा।
चंद्रमा की आंतरिक संरचना से जुड़े करीब 4.4 अरब पुराने रहस्य का खुलासा हुआ है। यह खोज न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के आगामी चंद्रयान-4 मिशन की सफलता के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकती है।
विज्ञापन
इस खोज को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के शोधकर्ताओं ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। अध्ययन का मुख्य केंद्र इल्मेनाइट-बेयरिंग क्यूमुलेट्स (आईबीसी) नामक दुर्लभ चट्टानें हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, लगभग 4.3 से 4.4 अरब साल पहले जब चंद्रमा पिघली हुई चट्टानों (मैग्मा) के एक विशाल महासागर से ढका था, तब इनका निर्माण हुआ था। जैसे-जैसे यह मैग्मा ठंडा हुआ, घने खनिज चंद्रमा की गहराई में समा गए, जो आज भी चंद्रमा के प्रारंभिक विकास का इतिहास लिए हुए हैं।
प्रयोगशाला में बनाया गया मिनी चंद्रमा का कृत्रिम वातावरण
चंद्रमा के इन प्राचीन रहस्यों को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला के भीतर चंद्रमा के आंतरिक हिस्से जैसी चरम स्थितियां पैदा कीं। प्रोफेसर सुजय घोष के नेतृत्व में टीम ने नमूनों को 3 गीगापास्कल तक के दबाव और 1,500 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर रखा। इस प्रयोग से यह स्पष्ट हुआ कि कैसे ये आईबीसी चट्टानें पिघलती हैं और चंद्रमा के मैंटल के साथ मिलकर वैसा ही मैग्मा बनाती हैं। ऐसा चंद्रमा की सतह पर मौजूद टाइटेनियम युक्त बेसाल्ट चट्टानों में पाया जाता है।
विज्ञापन
चंद्रयान-4 में इसलिए अहम है खोज
भारत का चंद्रयान-4 मिशन इस दशक के अंत तक चंद्रमा से नमूने वापस लाने के लिए तैयार है। प्रोफेसर सुजय घोष ने कहा कि जब भारत चंद्रमा से चट्टानें वापस लाएगा, तो हमें यह समझना होगा कि वे कहां बनीं और वे चंद्रमा के इतिहास के बारे में क्या बताती हैं। यह शोध मूल्यवान टाइटेनियम युक्त क्षेत्रों की पहचान करने, डेटा का विश्लेषण करने में मदद करेगा।
मैग्मा का जटिल सफर
अध्ययन में सामने आया कि अलग-अलग तापमान पर मैग्मा का व्यवहार बदल जाता है। जैसे उच्च तापमान, मध्यम टाइटेनियम युक्त पिघलाव सीधे बेसाल्ट बनाता है। कम तापमान, मैग्मा अधिक जटिल प्रक्रिया से गुजरता है और अन्य मैग्मा के साथ मिलकर उच्च-टाइटेनियम बेसाल्ट बनाता है। शोध से पता चला कि कम दबाव पर मैग्मा सतह पर आकर ज्वालामुखी का हिस्सा बनता है, जबकि अधिक दबाव पर कुछ मैग्मा वापस मैंटल में धंस जाता है। यह प्रक्रिया को मैंटल ओवरटर्न कहलाती है।