आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दो से सात सितंबर तक ब्रिटेन के दौरे पर हैं। आरएसएस प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर के अनुसार 100 से ज्यादा संगठनों ने उनका स्वागत किया है, जबकि सामुदायिक नेताओं के एक बड़े कार्यक्रम को 310 संगठन समर्थन दे रहे हैं। आंबेकर ने सरकारों के बीच कूटनीतिक संवाद के साथ लोगों के बीच सांस्कृतिक और सभ्यतागत संवाद की जरूरत बताई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत दो सितंबर को ब्रिटेन पहुंच चुके हैं। उनका दौरा सात सितंबर तक चलेगा। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने बताया कि यह दौरा आरएसएस के शताब्दी वर्ष के मौके पर हो रहा है। यह यात्रा ब्रिटेन के संगठन ‘इंटीग्रल’ के निमंत्रण पर हो रही है।
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ब्रिटेन में मोहन भागवत के कार्यक्रमों को कितना समर्थन मिल रहा है?
सुनील आंबेकर ने कहा कि ब्रिटेन में 100 से ज्यादा संगठन मोहन भागवत का स्वागत कर चुके हैं। ये संगठन उनके कार्यक्रमों में सहयोग भी कर रहे हैं। संघ की कोशिश ज्यादा से ज्यादा लोगों से संवाद करने की है। आने वाले समय में सामुदायिक नेताओं के लिए एक बड़ा कार्यक्रम भी आयोजित होगा, जिसे 310 संगठन समर्थन दे रहे हैं।
आरएसएस ब्रिटेन में सिर्फ भारतीय समुदाय से संवाद कर रहा है?
सुनील आंबेकर ने कहा कि संघ सभी से जुड़ने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारों के बीच होने वाली कूटनीतिक बातचीत अपनी जगह जरूरी है, लेकिन लोगों के बीच सीधे संवाद की भी जरूरत है। उन्होंने कहा कि सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंधों को भी मजबूत करना जरूरी है।
आरएसएस इस दौरे को इतना महत्वपूर्ण क्यों मान रहा है?
आंबेकर ने कहा कि आरएसएस संस्कृति और सभ्यता के आधार पर काम करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है और वैश्विक स्तर पर इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। उन्होंने कहा कि सरकारों के स्तर के संवाद के साथ लोगों के बीच संबंध भी जरूरी हैं। मोहन भागवत का यह दौरा इसी तरह के लोगों से लोगों और संस्कृति से संस्कृति के संवाद को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
पश्चिमी अकादमिक दुनिया में हिंदुत्व को लेकर आरएसएस की क्या दलील है?
हिंदुत्व की पश्चिमी अकादमिक समझ पर सवाल पूछा गया तो सुनील आंबेकर ने कहा कि इसे लेकर कई गलत धारणाएं हैं। उन्होंने कहा कि भारत को सिर्फ राजनीतिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से नहीं समझा जा सकता। भारत एक सांस्कृतिक अवधारणा है। आंबेकर ने यह भी कहा कि हिंदुत्व किसी एक धर्म की तरह तय अवधारणा नहीं है। इसमें अलग-अलग धर्मों और धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान और सत्य में विश्वास की बात है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मोहन भागवत का ब्रिटेन दौरा इन विचारों को स्पष्ट करने में मदद करेगा।