सार
IIMUN सम्मेलन में गंभीर मुद्दों पर चर्चा के बीच आखिर में एक हल्का-फुल्का और यादगार पल भी देखने को मिला। मोहन भागवत और ऋषभ शाह ने बातचीत खत्म करते हुए वायरल 'Clock It' जेस्चर किया, जो लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।
मोहन भागवत का 'Clock It' मोमेंट हुआ वायरल
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मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस सम्मेलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और IIMUN के संस्थापक ऋषभ शाह के बीच हुई बातचीत का समापन वायरल 'Clock It' जेस्चर के साथ हुआ। कार्यक्रम के अंत में दोनों का यह अंदाज चर्चा का विषय बन गया।
क्या 'Clock It' जेस्चर ने लोगों का ध्यान खींचा?
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मोहन भागवत और ऋषभ शाह ने बातचीत को वायरल 'Clock It' जेस्चर के साथ समाप्त किया। इस खास अंदाज ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और कार्यक्रम का यह पल चर्चा में आ गया।
आंदोलन करना राष्ट्रविरोधी नहीं, लोकतंत्र का हिस्सा: भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने वाले युवाओं को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि ये युवा इसी देश के नागरिक हैं और देश का भविष्य हैं। लोकतंत्र में आंदोलन अपनी बात रखने, संवाद शुरू करने और सहमति बनाने का एक वैध माध्यम है।
उन्होंने कहा कि किसी भी मतभेद का समाधान बातचीत और आपसी सम्मान से ही संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि समस्याओं का समाधान भारतीय संविधान के दायरे में ही तलाशा जाना चाहिए। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा दिए गए सांविधानिक मार्ग पर चलकर ही लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत हो सकती है।
आज का युवा हर बात पर सवाल पूछता है- भागवत
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में अलग सोच रखती है। उन्होंने कहा कि जेन-जी और जेन-अल्फा के युवा किसी भी बात को बिना समझे स्वीकार नहीं करते। वे हर विषय पर तार्किक और तथ्य आधारित जवाब चाहते हैं। वे हमारी पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार और देशभक्त हैं।
उन्होंने अपने समय का जिक्र करते हुए कहा कि पहले परिवार और समाज के बड़े-बुजुर्गों की बातें बिना सवाल किए मान ली जाती थीं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। उनके अनुसार यह बदलाव नकारात्मक नहीं, बल्कि सकारात्मक है क्योंकि आज के युवा देश के प्रति अधिक जिम्मेदार, ईमानदार और सेवा भाव रखने वाले हैं। भागवत ने यह भी कहा कि भारतीय परंपरा में 'शास्त्रार्थ' की संस्कृति रही है, जहां किसी भी विषय पर दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद निष्कर्ष निकाला जाता है। समाज में भी इसी प्रकार के संवाद की आवश्यकता है।