चुनाव पंडित उत्तर प्रदेश को लेकर जो भी विश्लेषण करें, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पूरा भरोसा है कि राज्य में पूर्ण बहुमत से भाजपा की सरकार बनेगी। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के कुछ नेता मानते हैं कि सीट दर सीट कांटे का संघर्ष है और चुनाव नतीजों का सारा दारोमदार जातीय और सामाजिक समीकरणों पर टिका है और जहां जिसके पक्ष में यह समीकरण होंगे वहां उसकी जीत होगी।कई सीटों पर दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट देने का भी नतीजों पर असर पड़ सकता है।
यह जानकारी देने वाले प्रधानमंत्री मोदी के एक बेहद करीबी सूत्र का यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री को उनके सूचना तंत्र के द्वारा बताया गया है कि नोटबंदी के बाद उनकी जो गरीब समर्थक छवि बनी है,उससे राज्य में आम जनता के बीच एक ऐसी खामोश आंधी चल रही है कि अगर वह मतदान तक बरकरार रही तो कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा तीन सौ से भी ज्यादा सीटें जीत सकती है।
केंद्र सरकार के एक प्रभावशाली मंत्री का भी दावा है कि पार्टी ने राज्य की सभी सीटों पर जो आंतरिक सर्वेक्षण कराया है, उसके नतीजे चौंकाने वाले हैं।
नोटबंदी का असर दुधारी तलवार जैसा है
उक्त मंत्री के मुताबिक नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक और सामाजिक समीकरण ध्वस्त हो गए हैं और जनता के बीच लोकसभा चुनावों की तरह ही मोदी लहर चल रही है। इसलिए विधानसभा चुनावों के नतीजे भी लोकसभा चुनावों जैसे ही हो सकते हैं। उक्त केंद्रीय मंत्री का कहना है कि दूसरे दलों से आए लोगों के टिकट से जो थोड़ी बहुत नाराजगी कार्यकर्ताओं में थी वह अब लगभग दूर हो गई है और फिर जब हवा चलती है तो छोटे मोटे कारण कोई बाधा नहीं डाल पाते।
लेकिन इसके उलट संघ का आकलन कुछ अलग है। संघ सूत्रों के मुताबिक नोटबंदी का असर दुधारी तलवार जैसा है। शुरु में आम लोगों खासकर गरीब जनता ने नोटबंदी को कालाधन, भ्रष्टाचार और अमीरों के खिलाफ सरकार का एक ऐसा कदम मानकर स्वागत किया जिससे उन्हें सीधे फायदा होगा।
लेकिन बाद में नकदी की किल्लत, बैंकों और एटीएम के बाहर लगने वाली लंबी लाइनों और छोटे कारोबारियों, व्यापारियों, दूकानदारों, मझोले और छोटे उद्योगों में नकदी के संकट से हुई बंदी और छंटनी से लोगों के बीच इस कदम को लेकर धीरे-धीरे नाराजगी भी बढ़ी है।
भाजपा ने किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया
साथ ही भाजपा ने किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जबकि सपा कांग्रेस गठबंधन से अखिलेश यादव और बसपा से मायावती का चेहरा सामने है। वहीं सपा में पिछले दिनों हुए आंतरिक घमासान के बाद अखिलेश ने अपनी छवि में जो इजाफा किया है, उसे भी संघ नेतृत्व अनदेखा नहीं कर रहा है।
संघ के एक पदाधिकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश में नोटबंदी की वजह से हिंदुत्व की धार भी कमजोर हुई है, इसलिए योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज जैसे गरम दल के नेताओं का भी वैसा असर नहीं हो रहा है जैसा कि होना चाहिए। इसलिए सारा दारोमदार अब जातीय समीकरणों और उम्मीदवार की जिताऊ क्षमता पर टिका है। वहीं संघ केकरीबी माने जाने वाले एक भाजपा महासचिव का कहना है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों जगह कई सीटों पर जिस तरह दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट दिया गया है, उससे भी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता असंतुष्ट हैं और उनका उत्साह घट गया है।
इसलिए चुनाव नतीजे वैसे आने मुश्किल हैं जैसी कि उम्मीद शुरु में की जा रही थी।