राज ठाकरे और उनकी मनसे पिछले विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद से ही हाशिए पर है। लेकिन लोकसभा चुनावों में राज ने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बना ली, जिसका फायदा उन्हें कांग्रेस एनसीपी गठबंधन के साथ जाने से हो सकता है। इसीलिए राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के प्रति अपने परंपरागत तेवर भी बेहद नरम कर लिए हैं। लंबे समय से उनका कोई बयान उत्तर भारतीयों के खिलाफ नहीं आया है।
एनसीपी नेता शरद पवार के साथ भी राज ठाकरे के बेहद अच्छे रिश्ते हैं। वहीं प्रकाश आंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी अफ इंडिया ने सांसद असउद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) के साथ गठजोड़ करके राज्य की लगभग सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इस वजह से कांग्रेस एनसीपी गठबंधन को खासा नुकसान हुआ। इसलिए विधानसभा चुनावों में भाजपा शिवसेना गठबंधन को कड़ी टक्कर देने के लिए कांग्रेस एनसीपी की कोशिश है कि राज ठाकरे और प्रकाश आंबेडकर को साथ लिया जाए।
राज ठाकरे का रुख तो कांग्रेस एनसीपी के प्रति नरम है लेकिन प्रकाश आंबेडकर को मनाने में कांग्रेस एनसीपी को थोड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। प्रकाश आंबेडकर महाराष्ट्र की राजनीति में बेहद मंजे हुए खिलाड़ी हैं और अपने जनसमर्थन के बदले में वह विधानसभा सीटों की खासी मांग रख सकते हैं।
जबकि कांग्रेस की कोशिश है कि प्रकाश आंबेडकर के साथ आने से पूरे राज्य में दलित मतदाता एकमुश्त होकर उसके साथ आ सकते हैं। सोनिया गांधी चाहती हैं कि आने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करे जिससे न सिर्फ उसके कार्यकर्ताओं का टूटा मनोबल वापस लौटे बल्कि देश की जनता में भी कांग्रेस के प्रति फिर से नया भरोसा पैदा हो सके।