अन्नाद्रमुक के 10 वर्ष तक चल शासन का अंत हुआ और एमके स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। उन्होंने दो तिहाई बहुमत जुटाकर ईडी पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक पर धमाकेदार जीत दर्ज की। यह पहला चुनाव था जो जयललिता और करुणानिधि की गैरमौजूदगी में लड़े गए।
द्रमुक गठबंधन में शामिल कांग्रेस के हिस्से में आई 25 सीटों में से उसने 16 जीती हैं, जबकि अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन कर भाजपा उम्मीदवार 20 सीटों पर लड़े और केवल दो सीटों पर ही जीत पाए। तमिलनाडु की दोनों प्रमुख पार्टियों 180-180 सीटों पर लड़ी थीं।
द्रमुक ने 54 सीटें अपने सहयोगियों को दी थीं। इनमें एमडीएमके, वीसीके, सीपीआई और सीपीएम को छह-छह सीटें, जबकि आईयूएमएल को तीन और एमकेके के हिस्से में दो सीटें थीं। वहीं अन्नाद्रमुक ने भाजपा के अलावा पीएमके को 23 सीटें दी थीं।
शशिकला को जगह नहीं
तमिलनाडु में द्रमुक को एकतरफा जीत नहीं मिलने से पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की करीबी रही शशिकला को अन्नद्रमुक में वापसी आसान नहीं होगी। न तो पलानीस्वामी उनके पार्टी में प्रवेश के पक्ष में है और न ही पनीरसेल्वम
द्रमुक गठबंधन रहा ज्यादा मजबूत
चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि लोग पलानीस्वामी की सरकार से नाराज नहीं थे। खास तौर पर उनकी सरकार द्वारा कोविड 19 के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक मोर्चे के प्रबंधन से।
लेकिन सरकार के प्रदर्शन पर 10 वर्ष की एंटी इनकम्बेंसी भारी पड़ी और एमके स्टालिन द्वारा कोई ठोस राजनीतिक कार्यक्रम न दिए जाने के बावजूद एक मजबूत गठबंधन की वजह से द्रमुक सरकार बनाने में सफल हो गया।
हर चुनाव में बदलती रही सत्ता
केरल की तरह ही तमिलनाडु में भी हर 5 साल में सत्ता पाला बदलती है। केवल पिछले चुनाव मं तत्कालीन सीएम जयललिता अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही थीं। अन्नाद्रमुक के खिलाफ 10 सालों की एंटी इनकम्बेंसी थी।