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विक्रम-1: स्काईरूट ने रचा इतिहास, छह पेलोड पृथ्वी की निचली कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किए

Sat, 18 Jul 2026 11:45 AM IST
अस्मिता त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला नई दिल्ली।

सार

आज देश का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग हो गई है। इस लॉन्चिंग ने निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। वही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी सराहना की है। उन्होंने इसे भारत के लिए एक ऐतिहासिक अध्याय बताया है। पढ़ें पूरी खबर...
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भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च हुआ। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सुबह 11:30 बजे होनी थी, लेकिन लॉन्च से कुछ देर पहले ही रोक दिया गया था। हालांकि कुछ देर बाद इसे दोबारा शुरू किया गया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट एयरोस्पेस को बधाई दी है। वहीं, विक्रम-1 के माध्यम से दो उपग्रहों सहित छह पेलोड को सफलतापूर्वक निम्न-पृथ्वी कक्षा में पहुंचाया।

पीएम मोदी ने दी बधाई

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श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर में मौजूद टीम से फोन पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि यह 'मिशन आगमन' है। इस आगमन को अभी और आगे बढ़ते जाना है। पीएम मोदी ने स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापकों से बात करते हुए कहा, 'सबसे पहले स्काईरूट एयरोस्पेस को पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई। मुझे इस सफलता के लिए आनंद है। मैं इस पूरे लॉन्चिंग कार्यक्रम को देख रहा था। आपकी पूरी टीम 20-30 साल की उम्र की दिखती है। ये मुझे और खुशी दे रही थी।'
 



क्या है मिशन आगमन?
मिशन आगमन विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इसका प्रक्षेपण आज सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाना है। इस मिशन के जरिए स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पूरी तरह स्वदेशी विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमताओं का परीक्षण करेगी।

 

विक्रम-1 रॉकेट की क्या खासियत है?

  • विक्रम-1 रॉकेट का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक, डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।

  • विक्रम-1 एक 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है, जिसे छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए तैयार किया गया है। 
  • यह पूरी तरह हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से बना है, जिससे इसका वजन कम और क्षमता अधिक हो जाती है। 
  • कंपनी के अनुसार कार्बन फाइबर सबसे मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट अधिक दक्ष बनता है।
  • रॉकेट में तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं, जबकि सबसे ऊपर एक ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है। 
  • यही मॉड्यूल एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने में मदद करेगा।
  •  विक्रम-1 को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है।

यह मिशन इतना अहम क्यों माना जा रहा है?

अब तक भारत में कक्षा में उपग्रह भेजने का काम मुख्य रूप से इसरो के रॉकेटों के जरिए होता रहा है। अगर विक्रम-1 सफल होता है तो भारत की निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं देने में सक्षम होंगी।

आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार यह मिशन छोटे उपग्रहों और छोटे लॉन्च व्हीकल के वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत कर सकता है। उनका कहना है कि वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। 

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विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष में क्या भेजा जाएगा?

मिशन आगमन में कई पेलोड भेजे जाएंगे। इनमें बंगलूरू की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित लैब में तैयार किया गया डायमंड लोटस भी शामिल है। साथ ही अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई गई माइक्रोआर्ट भी विक्रम-1 मिशन के साथ अंतरिक्ष में भेजी जा रही है। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार इतना छोटा है कि वे चावल के एक दाने से भी छोटी हैं।

इसके अलावा इस मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड भी अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जिस पर वंदे मातरम लिखा है। स्काईरूट के अनुसार इसके साथ कंपनी की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के शुभचिंतकों के हस्तलिखित संदेश भी भेजे जा रहे हैं।

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