अल्पसंख्यक आयोग खत्म करने की संघ की पुरानी मांग को नए क्लेवर में पेश करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह ने अल्पसंख्यक की परिभाषा को दोबारा से परिभाषित किए जाने की आवश्यक्ता बताई है। गिरिराज सिंह ने कहा है कि संविधान में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि देश में मुस्लिमों की संख्या जब 4-5 प्रतिशत थी। तब उन्हें अल्पसंख्यक माना गया। जबकि उनकी आबादी बढ़कर कर अब करीब 20 करोड़ हो गई है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी आबादी अल्पसंख्यक कैसे मानी जाएगी। इसलिए अल्पसंख्यक की परिभाषा को बदलने की जरूरत है।
गिरिराज सिंह के अनुसार जनसंख्या के लिहाज से देखें तो महज जैन, सिख और पारसी ही वास्तव में इस देश में
अल्पसंख्यक हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को अल्पसंख्यक की परिभाषा से बाहर लाना चाहिए। अल्पसंख्यक के नाम पर महज मुस्लिम ही लाभ उठा रहे हैं। गिरिराज का यहां तक मानना है कि जिन राजनीतिक दलों ने अपने यहां अल्पसंख्यक मोर्चा का गठन किया है, उसे खत्म कर देना चाहिए।
देवरस के जमाने से संघ की रही है अल्पसंख्यक आयोग खत्म करने की मांग
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने अल्पसंख्यकों की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की मांग कर मामले को बेशक दोबरा से गर्माने की कोशिश की है। मगर संघ के तृतीय सर संघ चालक बाला साहब देवरस के समय से ही भगवा परिवार की ओर से ऐसी मांग उठती रही है। देवरस के संघ प्रमुख रहते हुए संघ की ओर से इस बात के न सिर्फ प्रस्ताव पारित किए गए। बल्कि आंदोलन भी किए गए कि अल्पसंख्यक आयोग खत्म किया जाना चाहिए। संघ का मानना है कि देश में जब मानवाधिकार आयोग है तो अल्पसंख्यक आयोग की जरूरत ही नहीं है।
संघ यह भी मानता है कि संविधान के मूल में अल्पसंख्यक शब्द की चर्चा नहीं है। राजनीतिक लाभ के मकसद से इस शब्द को बाद में जोड़ा गया है। इसलिए संघ की ओर से पूरे संविधान को ही दोबारा से परिभाषित करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। इस मांग को केंद्रीय मंत्री ने नए अंदाज में पेश किया है। चंद महीने पहले भी विश्व हिन्दू परिषद की ओर से अल्पसंख्यक आयोग को खत्म करने की मांग सरकार के सामने रखी गई है।