मीठे पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों की आबादी में 1970 के बाद से 81 फीसदी की कमी आई है। इनमें सैल्मन, ट्राउट, ईल और स्टर्जन जैसी मछलियां शामिल हैं जो अपने जीवन के विभिन्न चरणों में लंबी यात्राएं करती हैं।
साफ पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों पर जारी लिविंग प्लैनेट इंडेक्स 2024 के अनुसार, इनमें हर साल औसतन 3.3 फीसदी की दर से गिरावट आ रही है। इस इंडेक्स में मछलियों की 284 प्रजातियों को ट्रैक किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासी मछलियां अपने अस्तित्व के लिए मीठे पानी की धाराओं और नदियों पर निर्भर हैं। प्रवास के दौरान इनमें से कुछ मछलियां हजारों किमी की लंबी यात्राएं करती हैं। ये छोटी धाराओं से लेकर बड़ी नदियों तक कभी-कभी तो पूरे महाद्वीप को पार कर उसी धारा में लौट आती हैं, जहां वे पैदा हुई थीं। बहामास के निकट अपने प्रजनन स्थल तक पहुंचने के लिए यूरोपीय ईल दो वर्षों में करीब 10 हजार किमी तक की यात्रा करती है। ऐसे में इन मछलियों की आबादी में आ रही गिरावट न केवल मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि इसकी वजह से लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा और जीविका पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्रों में सबसे ज्यादा गिरावट
दक्षिण अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्रों में 50 वर्षों में इन प्रजातियों की आबादी में 91 फीसदी की गिरावट आई है। यह वह क्षेत्र है जहां दुनिया में मीठे पानी का सबसे बड़ा प्रवास होता है, लेकिन समय के साथ बढ़ती इन्सानी महत्वाकांक्षा के कारण जिस तरह नदियों में बांध बनाए जा रहे हैं, खनन और धाराओं को मोड़ने के लिए परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, उसकी वजह से लगातार पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो रहा है। ये सभी कारण इनकी आबादी में गिरावट की वजह बन रहे हैं।
प्रवास के लिए नदियों का उन्मुक्त प्रवाह जरूरी
मीठे पानी की करीब एक तिहाई प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा प्रवासी मछलियों पर कहीं ज्यादा है। इनके प्रवास के लिए नदियों का उन्मुक्त प्रवाह जरूरी है, लेकिन प्रवाह में आ रही गिरावट इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। उदाहरण के लिए यूरोप में नदियों के उन्मुक्त बहाव की राह में बांध जैसी करीब 12 लाख बाधाएं मौजूद हैं। नदियों में बढ़ता प्रदूषण, इनका बेतहाशा हो रहा शिकार और जलवायु परिवर्तन भी इन प्रजातियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। इनकी आबादी में भारी गिरावट के लिए शहरों और उद्योगों से निकला गंदा पानी और खेतों से बहकर आने वाला पानी भी जिम्मेदार है, क्योंकि इसमें हानिकारक कीटनाशक मौजूद होते हैं जो इनके लिए खतरा बन रहे हैं।