फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कतारों में तब्दील मध्य वर्ग, कहीं टूट न जाए सब्र का बांध

Mon, 28 Nov 2016 03:56 PM IST
बीबीसी
विज्ञापन
विज्ञापन
उस दौर को बीते बहुत लंबा समय नहीं हुआ है जब भारतीय जरूरी सामान और सेवाओं के लिए लाइनों में घंटों खड़े रहते थे। मुझे याद है कि 'उचित कीमत' वाली दुकानों, सड़क के किनारे लगे नलों, सिनेमा घरों और बिजली ऑफिस के बाहर कैसे लंबी लाइनें लगती थीं।
विज्ञापन


लोग सस्ती खाद्य सामग्री और ईंधन, पानी भरने, सिनेमा और बिलों के भुगतान के लिए लंबी लाइनों में लगते थे। पोस्ट ऑफिस से पत्र भेजने के लिए भी लाइन में इंतजार करना पड़ता है।
इसमें स्टैंप खरीदने और पत्रों की जांच के लिए लाइन में लगकर इंतजार करना शामिल है। यहां तक कि मरने के बाद अंत्येष्टि के लिए भी लाइन में खड़ा होना पड़ता है।
विज्ञापन


भारतीय अर्थव्यवस्था अभावों में ही रही है। यहां तक कि संपन्न लोगों को एक कार और टेलीफोन के लिए भी सालों इंतजार करना पड़ता था। इन लाइनों का सीधा संबंध आपूर्ति में कमी से है।
जब आप लंबी दूरी का फोन लगाते थे तो जर्जर हालत में सरकारी नेटवर्क से एक ऑटोमैटिक आवाज आती थी कि आप कतार में हैं। ये सारी लाइनें बहुतों को व्लादिमीर सोरोकिन के उपन्यास के 'द क्यू' की याद दिलाती है।

इसमें स्टालिन के समय में सोवियत यूनियन में उन अंतहीन लाइनों का जिक्र है। इस उपन्यास में लिखा गया है कि पूरा सोवियत यूनियन कतारों में तब्दील हो गया है। इंडिया पिछले 25 सालों से आर्थिक तरक्की की राह पर है। इस तरक्की के क्रम में जिन्हें लाइनों की आदत थी वे गायब होते गए। हालांकि लाइनों में फिर भी लोग बचे हुए हैं। पूजा के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइनें खत्म नहीं हुई हैं।
शौचालयों में लाइन लगती है। अब भी भारत अभावग्रस्त है। पिछले दो हफ्तों से भारत में लगने वाली लाइनें काफी सुर्खियों में हैं।

सरकार ने देश की करेंसी के दो बड़े नोटों (500 और 1000) को अमान्य करार दिया था। सरकार के इस फैसले के कारण कुल करेंसी का 86 फीसदी हिस्सा बेकार हो गया था। इन नोटों को बदलने के लिए बैंकों के बाहर लंबी लाइनें लग रही हैं।
ये लाइनें किसी समाजवादी नियंत्रण वाली अर्थव्यव्स्था की याद दिलाती मालूम पड़ती हैं।

कैश के लिए लगने वाली लाइनों पर भारत में चर्चा गर्म है।

कैश के लिए लगने वाली लाइनों पर भारत में चर्चा गर्म है। हालांकि इसमें कुछ भी हैरान करने वाला नहीं है। बहुतों का मानना है कि सरकार के इस कदम से गरीबों को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है।
विपक्ष के एक नेता ने ट्वीट कर कहा, 'जाहिर है स्टैंडअप इंडिया को भारी कामयाबी मिली है। सभी भारतीय एक लाइन में खड़े हैं।' अन्य लोगों ने सरकार पर निशाना साधा कि लोग अपना ही पैसा नहीं निकाल सकते हैं। लाइन ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि भारतीयों में सब्र है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आगाह किए जाने के बावजूद लाइनों में कोई फसाद नहीं हुआ। हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि तीन दर्जन से ज्यादा लोगों ने लंबे समय तक लाइन में लगने कारण दम तोड़ दिया। हालांकि लोगों ने काफी हद तक खुद को सब्र के साथ व्यवस्थित रखा। गरीब लोग तो खुद को कंबल में लपेटे बैंकों को बाहर तड़के ही लाइन में लग जाते हैं ताकि कुछ पैसे निकाल वो अपनी दैनिक जरूरतें पूरी कर सकें।

लाइनों में भारतीयों ने अपने लिए जुगाड़ का भी खूब इस्तेमाल किया। लोगों ने पैसे देकर अपना काम कराने के लिए दूसरों को लाइन में लगाया। इस काम के लिए 90 रुपये प्रति घंटे भुगतान किया गया। ये लाइनें सामाजिक जुड़ाव के रूप में भी सामने आईं।

अजय गांधी लाइनों पर 19 महीनों से रिसर्च कर रहे हैं

रिपोर्ट्स के मुताबिक लोगों को पुराने दोस्त मिले और उन्होंने अगली मुलाकात की योजना बनाई। लोग लंबे इंतजार के कारण मैट और लंच बॉक्स भी साथ में लाने लगे।
रिपोर्ट्स के अनुसार ये लाइनें लोगों के लिए सुस्ताने, सामाजिक रूप से जुड़ने और साथ होने का जरिया बन गईं। लोगों की मदद पहुंचाने में दिलचस्पी रखने वालों ने पानी, चाय, बिस्कुट और अन्य जरूरी चीजों को मुफ्त में बांटना भी शुरू कर दिया।

इन लाइनों के साथ कुछ परेशान करने वाली चीजें भी जुड़ीं। आर्थिक तंगी के कारण एक दूल्हा अपनी शादी के दिन ही खुद को असहाय पाया। एक महिला ने लाइन में अपने पूर्व प्रेमी को देखा और उसने अपने परिवार वालों को फोन कर दिया। पूर्व प्रेमी को लाइन में ही पीट दिया गया।

एक जानी-मानी लेखिका ने लिखा है वह लाइन में लगने से परेशान नहीं होती हैं। वह लोगों के अगले उपन्यास के मसाला के रूप में देखती हैं। अजय गांधी पुरानी दिल्ली में लगने वाली लाइनों पर 19 महीनों से रिसर्च कर रहे हैं। वह भारत में लगने वाली लाइनों में सब्र, कुंठा, संतोष और मजाकिया माहौल देखते हैं। यह मध्यवर्ग के लिए दूसरों की जिंदगी को समझने का मौका भी है।
 

इसके साथ ही लाइनें अक्सर जेंडर और सामाजिक दबदबे के हिसाब से रही हैं

एक पत्रकार लाइन लगे बिल्कुल साधारण और संकोची चेहरों को याद करते हुए कहती हैं कि उनके पास न तो काला धन है और न ही सफेद। ये अच्छाई और ईश्वर पर भरोसा करने वाले लोग हैं।
ये हंसते हैं, रोते हैं, चिल्लाकर बात करते हैं। ये हर तरह के जुगाड़ जानते हैं। ये जहां जरूरत पड़े वहां मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। एक और ने लिखा है कि कैश लाइन में पहली बार उन्होंने इस देश के नागरिक की तरह व्यवहार करना सीखा। एक दोस्त ने कहा कि कैश लाइन ने सबको एक समतल जमीन पर खड़ा कर दिया।

हालांकि यह पूरी तरह से सच नहीं है। वाकई में मध्य वर्ग और संपन्न लोग कभी भारत में लगने वाली लाइनों का हिस्सा नहीं रहे। बंटे हुए और विषम समाज में परिवार, जाति और परिजनों के नेटवर्क के कारण इन्हें हमेशा बिना पसीना बहाए चीजों को हासिल करने में मदद मिली है। 

इसके साथ ही लाइनें अक्सर जेंडर और सामाजिक दबदबे के हिसाब से रही हैं। महिला, वीआईपी, पेंनशभोगी और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अलग लाइनें रही हैं। मतदान करने के लिए ही एक ऐसी लाइन भारत में लगती है जिसमें सारे लोग एक साथ होते हैं।
विज्ञापन

लाइनों से लोकतंत्र और समतावाद को बढ़ावा मिलता है

दिल्ली में रहने वाले समाजविज्ञानी संजय श्रीवास्तव ने मुझसे कहा कि लाइनों से लोकतंत्र और समतावाद को बढ़ावा मिलता है, यह भारत के लिए धोखा है।
उन्होंने कहा, ''मध्य वर्ग और मीडिया कई बार लाइनों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करता है। यह हम सबके लिए एक अस्थायी मामला है। यदि हमें हर दूसरे दिन जरूरी सामनों के लिए ऐसा करना पड़े तो ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती।''
संजय बिल्कुल सही हैं। जिन्हें लगता है कि कैश कतार के कारण एक नए समाज और नागरिकबोध का जन्म हो रहा है, तो वो इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। उन्हें ऐसा लगता है तो सरकारी हॉस्पिटलों की लाइनों का हिस्सा बनना चाहिए। कोर्ट में लगने वाली लाइनों में शरीक होना चाहिए।

इन दोनों जगहों पर लाखों लोग इलाज और इंसाफ के लिए इंतजार कर रहे हैं। जो रातों में जगकर पानी के लिए लाइन में लग रहे हैं वहां इन्हें जाना चाहिए। मैंने सूखे प्रभावित भारत के हिस्सों में ऐसी स्थिति देखी है। लाइन में लगने का असली दर्द ये जानते हैं। इन लाइनों से वे अब भी दूर नहीं हो पाए हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें