शोधकर्ताओं ने गोवा के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र से 251 जीवों का अध्ययन किया जिनमें नौ प्रजातियों की मछलियां और शेलफिश शामिल थीं। बेंथिक यानी समुद्र की तली से जुड़ी प्रजातियों के जीवों में 55% अधिक प्रदूषण मिला जबकि खुले पानी में तैरने वाली प्रजातियों के जीव यानी पेलैजिक में यह 45% दर्ज किया गया।
समुद्र में फैला प्लास्टिक प्रदूषण अब इन्सानों की थाली तक पहुंच चुका है। भारत में एक बार फिर प्लास्टिक के छोटे छोटे कणों से समुद्री जीवों के पेट भरे मिले हैं। गोवा के तटीय इलाकों से मिली मछलियों और शंख-घोंघा में माइक्रोप्लास्टिक मिला है। इससे पहले साल 2021 में भी वैज्ञानिकों की इसी टीम ने समुद्री भोजन में प्लास्टिक की मौजूदगी का खुलासा किया।
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एनवायरनमेंट रिसर्च पत्रिका में प्रकाशित नए अध्ययन में सीएसआईआर के राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ) ने कहा है कि जो लोग नियमित रूप से समुद्री भोजन खाते हैं, उनके शरीर में हर साल लगभग 10,780 प्लास्टिक कण पहुंच सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने गोवा के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र से 251 जीवों का अध्ययन किया जिनमें नौ प्रजातियों की मछलियां और शेलफिश शामिल थीं। बेंथिक यानी समुद्र की तली से जुड़ी प्रजातियों के जीवों में 55% अधिक प्रदूषण मिला जबकि खुले पानी में तैरने वाली प्रजातियों के जीव यानी पेलैजिक में यह 45% दर्ज किया गया। इतना ही नहीं, शोधकर्ताओं ने अध्ययन के दौरान समुद्री तलछट में 2500 कण प्रति किलो और पानी में 120 कण प्रति लीटर माइक्रोप्लास्टिक भी पाया। इस अध्ययन में सबसे अधिक मात्रा में फाइबर जैसे माइक्रोप्लास्टिक मिले जिनका मुख्य स्रोत मछली पकड़ने की गतिविधियां और अपशिष्ट जल माना गया।
अब अनदेखा करना जोखिम से भरा
सीएसआईआर-एनआईओ की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. महुआ साहा ने कहा कि समुद्री भोजन में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की अब अनदेखी नहीं की जा सकती। इस समस्या को रोकने के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकती है।
पाचन से इम्यून तक कमजोर
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के डॉ. अरविंद कुमार ने कहा कि समुद्री भोजन पर निर्भर लोगों के लिए यह समस्या काफी गंभीर हो सकती है। इस कारण लोगों को पाचन तंत्र, हार्मोन और इम्यून सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं। इसके लिए इन लोगों में स्वास्थ्य निगरानी और जागरूकता अभियान चलाने होंगे।