केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत 'सीएपीएफ' मुख्यालयों ने आरटीआई के तहत मांगी गई वीरता पदक अवार्डी, शहीद हुए जवान एवं सेवानिवृत्त अर्धसैनिकों की सूची देने से इनकार कर दिया है। कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह ने उक्त सूचना के लिए गृह मंत्रालय में आरटीआई लगाई थी। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, एसएसबी, आईटीबीपी और असम राइफल्स में से किसी भी बल मुख्यालयों ने सूचना नहीं दी है। तकरीबन सभी बलों ने आरटीआई के जवाब में कहा, सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 6 के पैरा-24 (1) में निहित प्रावधानों के तहत भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों को छोड़कर अन्य किसी भी प्रकार की सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
आरटीआई में इन बलों से मांगी गई थी जानकारी
सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, एसएसबी, आईटीबीपी और असम राइफल्स के मुख्यालयों से सूचना मांगी गई थी। उक्त सूचना के अंतर्गत राज्यवार वीरता प्राप्त पदक पुरस्कार विजेताओं की फोर्सवाइज सूची, शहीद हुए जवानों व विधवाओं की फोर्सवाइज सूची, सेवानिवृत्त हुए अर्धसैनिकों की फोर्सवाइज राज्यवार सूची, सड़क रेल हादसे में मारे गए सेवारत अर्थसैनिक बलों के जवानों की फोर्सवाइज राज्यवार सूची और सेवा दौरान आपसी शूटआउट में मरने व आत्महत्या करने वाले जवानों की फोर्सवाइज सूची, शामिल है। यह सूचना, जनवरी में मांगी गई थी।
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इस बात को ढाल बनाकर नहीं दी सूचना
सीआरपीएफ मुख्यालय ने आरटीआई के जवाब में कहा, सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 6 के पैरा-24 (1) में निहित प्रावधानों के तहत सीआरपीएफ को भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों को छोड़कर अन्य किसी भी प्रकार की सूचना देने से मुक्त रखा गया है। आरटीआई आवेदन में ऐसा कोई भी तथ्य नहीं दर्शाया गया है, जिससे यह प्रतीत होता हो कि यह मामला भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है। इसके चलते यह विभाग आरटीआई अधिनियम के तहत आपको सूचना उपलब्ध कराने के लिए बाध्य नहीं है। बीएसएफ द्वारा भी ऐसा ही जवाब दिया गया है। आईटीबीपी ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 6 के पैरा-24 (1) में निहित प्रावधानों का हवाला देकर जानकारी देने से मना कर दिया है। सीआईएसएफ की तरफ से भी यही जवाब मिला है।
...तो कैसे होगी अर्धसैनिक बलों के कल्याण की बात
महासचिव रणबीर सिंह का कहना है कि फोर्सेस डीजी द्वारा आरटीआई एक्ट की धारा-24 को ढाल बनाया गया है। इसके तहत मात्र दो मामले, भ्रष्टाचार व मानवाधिकारों के हनन से संबंधित मामलों को छोड़कर अन्य जानकारी देने के लिए बल महानिदेशालय बाध्य नहीं हैं। अब सवाल उठता है कि विभिन्न राज्यों में अर्धसैनिक बलों के कल्याण, पुनर्वास व अन्य भलाई से संबंधित सुविधाओं के लिए किस आधार पर बात की जाए। जिस किसी राज्य में संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों से मुलाकात कर पैरामिलिट्री के मुद्दों पर चर्चा की जाती है, तो सबसे पहले वहां की सरकारें, उक्त सूची उपलब्ध कराने के लिए कहते हैं। जब यह सूची नहीं मिलती तो अर्धसैनिक बलों के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी शुरू नहीं हो पाती।
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पहले सौ दिन की छुट्टी की सूचना भी नहीं दी गई
बतौर रणबीर सिंह, केंद्रीय गृह मंत्रालय से कोई गोला बारूद, हथियारों, डिप्लायमेंट या फोर्सेस संबंधित गुप्त सूचना तो नहीं मांग रहे कि जिससे राष्ट्रीय संप्रभुता को खतरा पैदा हो। कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन के सफल प्रयासों से हरियाणा देश का पहला ऐसा राज्य बना, जहां अर्धसैनिक कल्याण बोर्ड का गठन हुआ। अफसोस की बात ये है कि उपरोक्त बोर्ड के पास पैरामिलिट्री परिवारों की सूची ही उपलब्ध नहीं है। वहां नियुक्त कर्नल, कप्तान और सूबेदार सहित तमाम पदाधिकारी सेना से संबंधित हैं। उनका पैरामिलिट्री परिवारों की भलाई से कोई लेना देना नहीं है। ऐसे में उनका कल्याण या पुनर्वास कैसे संभव होगा। इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय से सीएपीएफ में सौ दिनों की छुट्टी योजना की जानकारी मांगी गई थी। सुरक्षा बलों में कितने जवानों को 100 दिन की सालाना छुट्टी दी गई है। इस जानकारी के जवाब में भी सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय 6 के पैरा-24 (1) में निहित प्रावधानों को ढाल बना दिया गया।