उन्होंने बताया कि खुफिया ब्यूरो से मांगे गए आकलन के मुताबिक इस मामले में जितना जल्दी हो अकबर का इस्तीफा लेना चाहिए वरना इसका संदेश अच्छा नहीं जा रहा है और जितनी भी देर होगी नुकसान बढ़ता जाएगा, खासकर महिलाओं के बीच सरकार की छवि महिला विरोधी बनने का खतरा है। एेसी हालत में विपक्ष को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री, सरकार और भाजपा पर हमला करने का बड़ा मुद्दा मिल जाएगा। बताया जाता है कि डोभाल ने अकबर से मुलाकात की और जब वह उनसे बातचीत कर रहे थे, तब सोशल मीडिया पर अकबर के खिलाफ हमले बढ़ते जा रहे थे। इसके बाद उनकी प्रधानमंत्री से बात हुई और अकबर का इस्तीफा लेने का फैसला हो गया।
गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली कभी भी सिर्फ आरोपों के आधार और विपक्ष के दबाव में अपने मंत्रियों या अन्य सहयोगियों से इस्तीफा न लेने की रही है। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए भी नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अपने किसी भी मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया। पुरुषोत्तम सोलंकी और बाबू भाई बोखरिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं। 2002 के दंगों में आरोपित माया बेन कोडनानी का इस्तीफा भी तब हुआ था जब अदालत ने उन पर लगे आरोपों का संज्ञान लिया और सजा सुनाई। इसी तरह मई 2014 में केंद्र में सरकार बनने के कुछ महीनों के बाद ही आईपीएल घोटाले में केंद्रीय एजेंसियों द्वारा वांछित ललित मोदी से कथित रिश्तों को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर चले विवाद के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष और मीडिया के दबाव में नहीं झुके।
इसी तरह राजस्थान की एक अदालत से एक महिला के यौन शोषण के आरोप में केंद्रीय राज्य मंत्री निहालचलंद मेघवाल के नाम समन जारी हुआ, तब भी मेघवाल के इस्तीफे की मांग को नहीं माना गया। इसलिए जब शुरू में सोशल मीडिया के मी टू अभियान में अकबर पर पत्रकार प्रिया रमानी ने कई साल पहले यौन शोषण का आरोप लगाया तो अकबर के इस्तीफे की संभावना किसी ने भी नहीं व्यक्त की थी। मोदी की राजनीतिक कार्यशैली को नजदीक से जानने वालों का मानना था कि अकबर का इस्तीफा नहीं होगा। इसलिए अपने विदेश दौरे से लौटते ही अकबर ने आक्रामक रुख अख्तियार किया और अपने ऊपर लगे आरोपों को पूरी तरह गलत बताते हुए प्रिया रमानी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया था।
अकबर के इस रुख के पीछे लोगों ने प्रधानमंत्री के कड़े रूख को माना। हालाकि अकबर के मुद्दे पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शुरु से ही चुप्पी साध ली थी, जबकि महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने मी टू मुहिम का समर्थन करते हुए अकबर को अपना पक्ष खुद स्पष्ट करने की सलाह दी थी। वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी अकबर पर लगे आरोपों की जांच की बात कही। संघ के सह कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने सोशल मीडिया के जरिए मी टू अभियान का समर्थन किया। उधर विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खामोशी तोड़ने और अकबर के इस्तीफे की मांग का अपना दबाव बढ़ा दिया। इसके बावजूद अकबर का इस्तीफा होगा, इसके संकेत नहीं मिल रहे थे।
क्योंकि भाजपा के नेता दबी जबान से कहते थे कि इस्तीफा लेने का मतलब अकबर को दोषी मान लेना और एक एसी नजीर बना देना होगा कि अगर कल को किसी और मंत्री पर मी टू के तहत आरोप लग जाए तो विपक्ष को उसका भी इस्तीफा मांगने पर दे देना होगा। लेकिन बाहर भीतर के बनते और बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री को जब इस मामले की जनता के बीच हो रही प्रतिक्रिया के बारे में खुफिया एजेंसी के आकलन से अवगत कराया गया तो उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए अकबर का इस्तीफा ले लिया और मंजूर कर लिया।