सीआरपीएफ में 40 साल से ज्यादा आयु वाले कुछ कर्मियों को इसी बल की नॉन कॉम्बेट विंग में भेजने के लिए भी अलग से नीति बनाने की बात कही गई थी।
विलय योजना की शुरुआत इसी साल से होनी थी। बतौर ट्रॉयल, विलय के पहले बैच में दो हजार सिपाहियों को दूसरे बल में भेजा जाना था। देश में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संख्या 10 लाख से अधिक है।
सीआरपीएफ में 3.25 लाख से ज्यादा अफसर और जवान हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की बैठक में तय हुआ था कि कॉम्बेट ऑपरेशन में भाग लेने के लिए आयु की एक निर्धारित सीमा तय होनी चाहिए।
सीआरपीएफ ने एक प्रोफेशनल फोर्स होने के नाते जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व और नक्सल प्रभावित इलाकों में किए जाने वाले कॉम्बेट ऑपरेशंस में खासी सफलता हासिल की है। इसी वजह से कॉम्बेट ऑपरेशन में ज्यादा से ज्यादा युवाओं को मौका दिया जाए।
गत वर्ष सीआरपीएफ में 24 हजार से अधिक जवान ऐसे थे, जो विभागीय स्वास्थ्य परीक्षण में खरे नहीं उतर सके। इनमें बहुत से जवानों की आयु 45 साल से ज्यादा थी।
ड्यूटी के हिसाब से स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण नक्सल क्षेत्र में तैनात आठ सौ जवानों को ऑपरेशन एरिया से कम जोखिम वाली दूसरी बटालियनों या यूनिट मुख्यालयों पर भेजने का आदेश जारी किया गया था।
केंद्रीय सुरक्षा बलों के एक आला अधिकारी जो इस प्रक्रिया में सीधे तौर पर जुड़े हैं, उनका कहना है कि ये बड़ी अटपटी सी स्थिति है। कोई भी फोर्स, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, दूसरे बल के और वह भी केवल 40 साल से अधिक आयु वाले कर्मियों को लेने में खुद को असहज महसूस करेगी।
सीआईएसएफ और एसएसबी अपने यहां विलय के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि इन दोनों बलों में सीधे तौर पर कॉम्बेट जैसी ऑपरेशनल ड्यूटी नहीं होती। इसके बावजूद ये दोनों ही बल इस विलय योजना के पक्ष में नहीं हैं।