हॉलीवुड से शुरू हुआ मी टू अभियान अब भारत में काफी जोर-शोर से फैल रहा है। इसके जरिए महिलाएं अपने साथ हुए अनाचार को सोशल मीडिया के जरिए शेयर कर रही हैं। मी टू एक बार फिर सुर्खियों में हैं और ऐसा अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के एक ताजे आक्षेप के बाद हुआ। उन्होंने अभिनेता नाना पाटेकर के खिलाफ कुछ आरोप लगाए। जिसके बाद कुछ लोग उनके पक्ष में आए तो कुछ विपक्ष में खड़े हो गए। इसके बाद तो मानों आरोपों की झड़ी लग गई। केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर से लेकर चरित्र अभिनेता आलोक नाथ, विकास बहल, रजत कपूर, चेतन भगत से लेकर तन्मय भट्ट तक इससे अछूते नहीं रहे।
आपको जानकर हैरत होगी कि हाल में
मी टू के तहत सामने आए नामों से जुड़े प्रकरण एक और दो दशक पुराने भी हैं। ऐसे में यह सवाल मुंह खोले खड़ा है कि कहीं मी टू का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए भी तो नहीं हो रहा है। निश्चित तौर पर जिन लोगों ने नीच हरकत की है उनका नाम सामने आना चाहिए और हो सके तो उन्हें सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन इस अभियान का दुरुपयोग ना हो यह सुनिश्चित करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है।
मी टू की वजह से बहुत से लोग महिलाओं के जज्बे को सलाम कर रहे हैं। वहीं कुछ इसपर सवाल भी उठा रहे हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि आखिर उन्हें बोलने में इतने सालों का समय क्यों लगा? जिस तरह से हर चीज के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। इस आशंका से बिलकुल भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस अभियान के जरिए बदला लेने और बदनाम करने जैसी हरकत नहीं होगी।
माना जा रहा है कि प्यार में धोखा खा चुकीं और असफल प्रेमिकाएं मी टू के जरिये बदला लेने जैसी हरकत कर सकती हैं। कोई सहकर्मी अपने बॉस को फंसाने या उससे बदला लेने या उसे अपमानित करने के लिए भी इस अभियान का फायदा उठा सकती हैं। अपमान और धोखे को बलात्कार या यौन शोषण का नाम देकर जहां पीड़िता समाज से सांत्वना पा सकती है, वहीं इससे आरोपी समाज के उन चंद अपराधियों की श्रेणी में आकर खड़ा हो जाएगा जिनकी वजह से समाज बदनाम होता है।
इस अभियान को यदि भेड़चाल का नाम दिया जाए तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह अभियान अश्वत्थामा के उस ब्रह्मास्त्र की तरह है, जिसका संधान करके लक्ष्य पर दागा तो जा सकता है, लेकिन उसे वापस नहीं लिया जा सकता। नतीजा किसी व्यक्ति द्वारा बरसों की मेहनत से कमाया गया नाम-मान-सम्मान मिट्टी में मिल सकता है।
कुछ लोग इसका इस्तेमाल मौन सहमति के तौर पर कर रही हैं। उन्हें पता है कि सामने वाला आपको कुछ नहीं कहेगा क्योंकि आरोप लगाने वाली एक महिला है। जिसकी छवि हमेशा से एक अबला और निर्बल नारी की रही है। यदि आपने उसे कुछ कहा तो सारा समाज आपको गलत साबित करने में जुट जाएगा।
मी टू अभियान को लेकर सवाल करना इसलिए भी जायज है क्योंकि यदि घटना के समय आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो आखिर अब क्यों। अब ऐसा क्या हुआ कि आपको अपने साथ बरसों पुरानी हुई घटना की अचानक से याद आ गई। जब उस समय मौन रहीं तो अब बोलने का आखिर क्या फायदा है। किसलिए? ऐसा हो सकता है कि आपके कथित आरोपी का अब एक हंसता-खेलता परिवार हो जिसे कि आपका एक
फेसबुक पोस्ट चुटकियों में बर्बाद करने की क्षमता रखता है।
इस अभियान ने सारे पुरुषों को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। जिससे कि अब हर महिला, बच्ची डरेगी। इसका इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जा रहा है। हर पुरुष आज डर के साए में जी रहा है कि कहीं इसका अगला शिकार वही तो नहीं है।
कार्यस्थल पर कई बार हम अपने पुरुष साथियों के साथ हंसी-मजाक करते हैं। लेकिन इस मी टू नाम की बला ने ऐसा कहर ढाया है कि सबको डर लगने लगा है। उन्हें लग रहा है कि कहीं कुछ ऐसी बात ना निकल जाए जिससे वह आरोपी और महिला विरोधी वाली श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया जाए। इस अभियान को अतिवादी फेमिनिज्म और अति प्रेक्टिकल अप्रोच वाला रखना दोनों ही हमारे लिए घातक सिद्ध होंगे।
वहीं कुछ लोग इसका इस्तेमाल केवल लाइमलाइट में आने के लिए कर रहे हैं। जिससे ग्लैमर की दुनिया में दोबारा से उनकी पूछ होने लगे या उनपर दया करके कोई उनकी बिगड़ी हुई नैय्या को पार लगा दे। अंत में हम बस इतना कहना चाहते हैं कि यह अभियान गलत नहीं है। लेकिन इसका गलत इस्तेमाल बिलकुल नहीं होना चाहिए। जो गलत हैं केवल उन्हें गलत कहा जाए, किसी बेकसूर को इस अभियान के समुंदर में डुबोकर ना मारें।