बेहतर इलाज के नाम पर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों से दवा की ऊंची कीमतों के रूप में भी लूट हो रही है। अस्पतालों की इस लूट से मरीजों को बचाने के लिए कड़े कदम भी उठाती है, लेकिन यह सिर्फ कागजों तक सिमट के रह गई है। औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के आंकड़े बताते हैं कि दवा की ज्यादा कीमत वसूलने पर कंपनियों पर इस साल 31 मार्च तक 10,029 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया गया, लेकिन वसूली सिर्फ 1,582.4 करोड़ रुपये की हो सकी, यानी 8,447.4 करोड़ रुपये (84 फीसदी) अब भी बाकी हैं। उत्तर प्रदेश में अस्पतालों की तरफ से 67 फीसदी और कर्नाटक में 52 फीसदी ज्यादा कीमत वसूलने के मामले सामने आए हैं।
बड़े मामलों में सिप्ला समेत कई कंपनियां कंपनीवार रिकॉर्ड में सिप्ला, जॉनसन एंड जॉनसन, रैनबैक्सी, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और सन फार्मा जैसी कंपनियों के खिलाफ बड़ी रकम के मामले दर्ज हैं। सिप्ला के एक सालबुटामोल मामले में ब्याज समेत 742.82 करोड़ रुपये की जुर्माना दर्ज है, जिसमें 93.96 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं।
70% तक सस्ती होंगी कैंसर की दवाएं
केंद्र सरकार ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सभी गैर-अनुसूचित दवाओं पर ट्रेड मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का 30 फीसदी तक करने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले से कैंसर की दवाएं 70 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं, जिससे आम मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी।
सूत्रों के मुताबिक, इस नई व्यवस्था ब्रांडेड, जेनेरिक, घरेलू, आयातित, पेटेंट और गैर-पेटेंट समेत कैंसर की सभी श्रेणियों की लगभग 110 दवाओं पर समान रूप से लागू होगी, जिनमें 35 पेटेंट वाली दवाएं भी शामिल हैं। यह आदेश इसी महीने के अंत तक प्रभावी हो सकता है। सरकार के इस कदम से बाजार में दवाओं की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित रहते हुए मरीजों पर वित्तीय बोझ काफी हद तक कम होगा।
ट्रेड मार्जिन क्या है: ट्रेड मार्जिन वह अंतर है जो दवा कंपनी की ओर से पहले वितरक या स्टॉकिस्ट को बेची गई कीमत और मरीज की ओर से दवा के लिए चुकाई जाने वाली अंतिम कीमत के बीच होता है। उदाहरण के लिए यदि किसी दवा को कंपनी वितरक को 100 रुपये में बेचती है और रिटेलर उसे मरीज को 500 रुपये में बेचता है, तो बीच का 400 रुपये (400%) ट्रेड मार्जिन कहलाता है। चूंकि गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं होता, इसलिए कंपनियां अपने विशिष्ट ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए ट्रेड मार्जिन का ऑफर करती हैं।
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गिफ्ट देकर दवा नहीं लिखवा पाएंगी कंपनियां
सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनियों द्वारा अपनी ब्रांडेड दवाएं लिखवाने के लिए डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएं और अन्य फ्रीबीज (मुफ्त सुविधाएं) देने की अनैतिक प्रथा पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले में केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक विशेष कमेटी का गठन करे। यह कमेटी दवा कंपनियों की गलत और अनैतिक मार्केटिंग प्रैक्टिस को रोकने और इसे कानूनी नियमों के दायरे में लाने के लिए अपने कड़े सुझाव और सिफारिशें तैयार करेगी। यह मुद्दा ऐसे समय सामने आया है जब शीर्ष न्यायालय दवाओं की कीमत और उनकी किफायती उपलब्धता से जुड़े एक अलग मामले की भी जांच कर रहा है।
जुर्माना 10,000 करोड़, 84 फीसदी अब भी जमा नहीं
नई दिल्ली (हिमांशु अरविंद मिश्र)। बेहतर इलाज के नाम पर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों से दवा की ऊंची कीमतों के रूप में भी लूट हो रही है। अस्पतालों की इस लूट से मरीजों को बचाने के लिए कड़े कदम भी उठाती है, लेकिन यह सिर्फ कागजों तक सिमट के रह गई है। औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के आंकड़े बताते हैं कि दवा की ज्यादा कीमत वसूलने पर कंपनियों पर इस साल 31 मार्च तक 10,029 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया गया, लेकिन वसूली सिर्फ 1,582.4 करोड़ रुपये की हो सकी, यानी 8,447.4 करोड़ रुपये (84 फीसदी) अब भी बाकी हैं। उत्तर प्रदेश में अस्पतालों की तरफ से 67 फीसदी और कर्नाटक में 52 फीसदी ज्यादा कीमत वसूलने के मामले सामने आए हैं।
बड़े मामलों में सिप्ला समेत कई कंपनियां कंपनीवार रिकॉर्ड में सिप्ला, जॉनसन एंड जॉनसन, रैनबैक्सी, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और सन फार्मा जैसी कंपनियों के खिलाफ बड़ी रकम के मामले दर्ज हैं। सिप्ला के एक सालबुटामोल मामले में ब्याज समेत 742.82 करोड़ रुपये की जुर्माना दर्ज है, जिसमें 93.96 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं।