अरविंद केजरीवाल ने हिंदू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी करने के कारण अपने कैबिनेट मंत्री राजेंद्र पाल गौतम (Rajendra Pal Gautam) का इस्तीफा ले लिया था। लेकिन जैसे ही दिल्ली नगर निगम चुनाव (Delhi MCD Election 2022) के लिए आम आदमी पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची सामने आई, राजधानी की राजनीति गरमा गई क्योंकि इसमें राजेंद्र पाल गौतम का नाम शामिल था। यानी अब राजेंद्र पाल गौतम दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों का प्रचार करते हुए दिखाई पड़ेंगे। बड़ा प्रश्न है कि केजरीवाल को राजेंद्र पाल गौतम को इतनी जल्द वापस लाने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा? क्या राजेंद्र पाल गौतम पर कार्रवाई के कारण दिल्ली का दलित मतदाता पार्टी से नाराज था जिसका गुस्सा शांत करने के लिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ा? लेकिन क्या अब गौतम के बयानों के कारण गुजरात में हिंदू मतदाताओं के नाराज होने का खतरा नहीं है?
क्यों लिया इस्तीफा?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राजेंद्र पाल गौतम अरविंद केजरीवाल के लिए ‘गले की हड्डी’ बन गए थे। वे न तो उन पर ठोस कार्रवाई कर पा रहे थे, न ही वे खुलकर उन्हें अपना पा रहे थे। राजेंद्र पाल गौतम ने केजरीवाल की मुश्किल उस समय में बढ़ा दी थी जब वे गुजरात में खुद को बड़े हिंदू नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर हिंदू मतदाताओं को लुभाने की कोशिशों में जुटे थे। वे गुजरात में स्वयं को भगवान कृष्ण का वंशज बताकर ‘कंसों’ का विनाश करने की बात कर सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
27 साल से गुजरात की सत्ता में बैठी भाजपा के लिए केजरीवाल का यह दांव कुछ हद तक सफल भी होता दिख रहा था, लेकिन इसी बीच राजेंद्र पाल गौतम ने पांच अक्तूबर को एक कार्यक्रम में हिंदू देवी-देवताओं के लिए अभद्र टिप्पणी कर भाजपा को अवसर दे दिया। राजेंद्र पाल गौतम के बयानों के आधार पर भाजपा केजरीवाल को ‘हिंदू विरोधी’ के रूप में लगातार प्रचारित कर रही थी।
गौतम अपने बयानों के बीच उन कृष्ण की पूजा न करने की अपील करते हुए भी दिखाई पड़े थे जिन्हें गुजरात के घर-घर में पूजा जाता है। गुजरात के लोग द्वारकाधीश से जोड़कर ही अपनी संस्कृति की कल्पना कर पाते हैं। ऐसे में कृष्ण की पूजा न करने की अपील करना गुजरात में केजरीवाल के खिलाफ बड़ा संवेदनशील मामला बन सकता था। मुख्य रूप से किसान और व्यापारी, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में काफी धार्मिक विचार वाली गुजरात की जनता के बीच यह मामला आम आदमी पार्टी पर भारी पड़ सकता था। यही कारण है कि आनन-फानन में गौतम का इस्तीफा ले लिया गया।
दिल्ली में भी हुई प्रतिक्रिया
लेकिन जिस समय अरविंद केजरीवाल ने राजेंद्र पाल गौतम को मंत्रिमंडल से हटाया, उसकी एक प्रतिक्रिया दिल्ली में भी हुई। दिल्ली के दलित और बौद्ध मतदाताओं के बीच यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया। चूंकि, राजेंद्र पाल गौतम ने अपने कार्यक्रम में उन्हीं बातों को दुहराया था जिन्हें स्वयं बाबा साहब आंबेडकर ने दुहराया था, उन्हें हटाने से दलित-बौद्ध मतदाताओं में सरकार के प्रति नाराजगी दिखाई पड़ी। इस विवादित धर्मांतरण कार्यक्रम में बाबा साहब आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर भी शामिल थे, जिनकी आज भी दलित समुदाय के लोगों में काफी इज्जत है। लोग सरकार के इस कदम को दलितों के खिलाफ कदम मानने लगे थे।
क्यों लिया वापस?
लेकिन अरविंद केजरीवाल दलित मतदाताओं को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकते थे। उनकी पूरी सियासी यात्रा में मुसलमानों के साथ-साथ दलित मतदाता आधार स्तंभ के रूप में कार्य करते रहे हैं। दिल्ली में सफाई कर्मचारियों का मुद्दा आज भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है और आम आदमी पार्टी लगातार उनके मुद्दों को हवा देती रही है। दिल्ली एमसीडी में किसी दल की सरकार बनाने में ये मतदाता अहम भूमिका निभा सकते हैं। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल अब उस डैमेज कंट्रोल की कोशिश में लग गए जिससे गौतम को हटाने से दिल्ली में कोई नुकसान न हो। इसका रास्ता उन्हें पार्टी का स्टार प्रचारक बनाकर तैयार किया गया।
भाजपा ने लगाए ये आरोप
दिल्ली भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रवीण शंकर कपूर ने अमर उजाला से कहा कि अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी हमेशा से हिंदू विरोधी काम करती रही है। यह केवल राजेंद्र पाल गौतम के बयानों से ही साबित नहीं होता है, उनके गुजरात के नेता गोपाल इटालिया और इसुदान गढ़वी भी हमेशा हिन्दुओं, देवी-देवताओं और मंदिरों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजेंद्र पाल गौतम को हटाकर भी केजरीवाल राजनीति कर रहे थे और अब उन्हें वापस लाकर भी वे राजनीति ही कर रहे हैं। लेकिन उन्हें जनता को नासमझ समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। हिंदू मतदाताओं की नाराजगी चुनाव परिणामों के रूप में साफ दिखाई पड़ेगी।
प्रवीण शंकर कपूर ने कहा कि देश में हिंदू और बौद्ध समुदाय का सदैव से बेहतर संबंध रहा है। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने राजेंद्र गौतम प्रकरण के सहारे दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक पद पर बैठे होने के कारण उन्हें लोगों को आपस में जोड़ने के लिए काम करना चाहिए, जबकि वे दो समुदायों में टकराव बढ़ाने का काम कर रहे हैं जो शर्मनाक है।
क्या अब नहीं होगा नुकसान?
राजनीतिक विश्लेषक सुधीर कुमार ने अमर उजाला से कहा कि भारतीय मतदाताओं के बारे में यह बात अक्सर कही जाती है कि वे बहुत संवेदनशील होते हैं, लेकिन उनकी याददाश्त बहुत छोटी होती है। वे किसी बात पर तुरंत बेहद आक्रामक प्रतिक्रिया करते हैं, लेकिन किसी मामले पर थोड़ी कार्रवाई होने के बाद जल्दी ही उसे भुला भी देते हैं। शायद अरविंद केजरीवाल ने मतदाताओं की इसी नजब को ध्यान में रखा और पहले तो राजेंद्र पाल गौतम को तुरंत कैबिनेट से हटाकर लोगों का गुस्सा शांत कर दिया।
लेकिन जैसे ही दिल्ली के नगर निगम चुनावों का मामला सामने आया, केजरीवाल ने गौतम को वपस लाकर दिल्ली के दलित मतदाताओं को साधने का काम किया है। वे दिल्ली की राजनीति में दलित मतदाताओं की नाराजगी का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। उनका मानना है कि अब इस मुद्दे की धार कमजोर पड़ गई है, हालांकि भाजपा इसे एक मुद्दा बनाने की कोशिश अवश्य कर सकती है।