वे कहते हैं तीन तलाक, हम कहते हैं तीन तलाक ही क्यों, इस्लाम में तो एक तलाक भी गुनाह है। तलाक तो एक बार कहने से भी हो जाता है और दो बार कहने से भी होता है। हमें मोदी की नीयत पर शक कतई नहीं है, लेकिन तीन तलाक को अपराधिक मामला बनाने की बजाए अगर कोई मध्यमार्गी राह निकल जाए तो वह ज्यादा सार्थक रहेगा। पति जेल में चला जाएगा और बच्चे सड़क पर होंगे। क्या यह व्यवस्था किसी भी सभ्य समुदाय में स्वीकार्य होगी, तीन तलाक के बिल को पास कराने से पहले इस पर विचार जरुरी है।
फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद ने तीन तलाक को लेकर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ खास बातचीत की। उनका कहना है, तीन तलाक कहने से ही तलाक नहीं होता। अगर कोई एक बार तलाक कह दे तो भी संबंध खत्म माना जाता है। इस प्रक्रिया में बातचीत शुरू होने का एक चांस रहता है। दोनों पक्षों में यह गुंजाइश बनी रहती है कि वे दोबारा से रिश्ता जोड़ सकते हैं। हमारा कहना यह है कि सरकार कोई ऐसी नीति बना देती, जिससे मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार बंद हो जाए। तीन तलाक बिल के मौजूदा प्रावधानों में पति को तीन साल की सजा हो सकती है। ऐसे में पत्नी को खर्च भी नहीं मिलेगा। बच्चे-मां बाप सब बर्बाद हो जाएंगे।
मुकर्रम अहमद बताते हैं कि तलाक शब्द से ही अल्लाह नाराज हो जाता है। तलाक शब्द का इस्तेमाल वे लोग करते हैं जो शैतान को खुश करना चाहते हैं। ऐसे लोगों से अल्लाह बहुत नाराज होता है। कुछ ऐसा हो कि जुबान पर तलाक का शब्द ही न आए। हम सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। हमारा कहना है कि सरकार इसे अपराधिक मामला न बनाए। कोई बीच का रास्ता निकल जाए तो सही रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा, हमें हुकूमत पर शक नहीं है, मगर तीन तलाक पर कानून बनाने से पहले सभी पक्षों से पूछ लेते तो कोई न कोई बीच का मार्ग निकल आता।