कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए मास्क, हाथ धोना और दो गज की दूरी को बहुत जरूरी माना गया है। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में लोग मास्क को ही अपना दुश्मन बना रहे हैं। यह एक बड़े खतरे का संकेत है।
डॉक्टरों का कहना है कि बहुत से लोग मास्क को अपनी नाक के नीचे रखते हैं। वे समझते हैं कि अब कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। मास्क को उतारना कैसे है या उसे इधर-उधर किस तरह सरकाना है, उनका ये तरीका भी जोखिम भरा है।
एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया बताते हैं कि मास्क को लेकर लोगों में सही समझ होना जरूरी है। हमारी आबादी का एक बड़ा तबका यह गलती कर रहा है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में वैक्सीन कार्यक्रम पूरा नहीं हो जाता, लोगों को ठीक तरह से मास्क पहनना, हाथ साफ करना और दो गज की दूरी, इन बातों से नाता बनाए रखना है। ऐसा भी देखने में मिला है कि बहुत से कामकाजी लोग मास्क को जेब में रखने की बजाए उसे आसपास रख देते हैं। उसे नियमित तौर पर साफ नहीं किया जाता। ग्रामीण इलाकों में यह एक बड़े खतरे का संकेत है।
येल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मुशफिक मुबारक की टीम ने एक अध्ययन भी किया है। हालांकि उनका अध्ययन बांग्लादेश को लेकर था। इसमें कई ऐसे तथ्य सामने आए, जो भारत के बड़े हिस्से में सही साबित हो रहे थे। डॉ. गुलेरिया के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में देखा गया कि कोरोना की पहली लहर के दौरान वहां बहुत कम लोग मास्क लगा रहे थे। वे दूसरा कोई कपड़ा, जो सिर पर या गले में पड़ा रहता है, उसे ही मुंह पर लपेट लेते थे।
जब मन किया तो उससे हाथ साफ कर लिया। बस में सीट खराब है तो उसी कपड़े से वह सीट भी साफ कर लेते हैं। जो लोग मास्क लगा रहे थे, उन्हें यह नहीं मालूम था कि यह संक्रमण को रोक पाने में कारगर है या नहीं। चालान से बचने या दूसरे लोगों के सामने शर्मिंदगी के भय के चलते वे मास्क को एक औपचारिकता मानकर लगा लेते हैं। बता दें कि मास्क को लेकर समय-समय पर स्वास्थ्य मंत्रालय भी गाइडलाइन जारी करता है।