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वैवाहिक दुष्कर्म पर कब होगी सुनवाई? केंद्र के रुख के बाद तारीख तय करेगा सुप्रीम कोर्ट, जानें क्या है मामला

Mon, 07 Sep 2026 03:13 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध मानने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सुनवाई की तारीख तय नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि पहले केंद्र सरकार का रुख सामने आ जाए, उसके बाद उचित तारीख तय की जाएगी। मामला पुराने कानून से लेकर नए भारतीय न्याय संहिता तक पहुंच चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट के बंटे फैसले के बाद अब सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस अपवाद को असंवैधानिक मानेगा? आइए, विस्तार से पूरे मामले को समझते हैं...
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध के दायरे में लाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह केंद्र सरकार का रुख जानने के बाद सुनवाई की उपयुक्त तारीख तय करेगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने नवंबर में मामले की सुनवाई के लिए निश्चित तारीख देने की मांग की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।

बुधवार को होने वाली सुनवाई में क्या होगा?

  • इंदिरा जयसिंह ने कहा कि मामले बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं, लेकिन केंद्र ने अभी तक कोई विस्तृत जवाब दाखिल नहीं किया है। उन्होंने कहा कि केंद्र की ओर से अभी सिर्फ शुरुआती आपत्ति दाखिल की गई है और याचिकाकर्ताओं के बीच भी सभी याचिकाओं का आदान-प्रदान नहीं हुआ है। 
  • उनका कहना था कि पक्षकारों को यह भी स्पष्ट नहीं है कि अलग-अलग याचिकाओं में कितनी समानताएं और कितने अंतर हैं। इस पर पीठ ने कहा कि बुधवार को केंद्र की बात सुनी जाएगी और उसके बाद उचित तारीख तय की जाएगी। वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने भी कहा कि ऐसी तारीख तय की जा सकती है, जिससे सभी पक्ष अपनी दलीलों की तैयारी पूरी कर सकें।

मामला आखिर किस कानून और किस सवाल पर है?

  • इन याचिकाओं में वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े आपराधिक कानून के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और उनकी व्याख्या को चुनौती दी गई है। पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में अपवाद था कि 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध या यौन कृत्य को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। 
  • भारतीय दंड संहिता अब खत्म हो चुकी है, लेकिन नए कानून भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में भी इसी तरह का अपवाद रखा गया है। नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए और उन्होंने भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता तथा साक्ष्य अधिनियम की जगह ली।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले केंद्र से कब जवाब मांगा था?

सुप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी 2023 को उन याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जिनमें वयस्क पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने पर पति को आपराधिक कार्रवाई से मिलने वाली सुरक्षा को चुनौती दी गई थी। बाद में नए भारतीय न्याय संहिता में मौजूद प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि पति को यह कानूनी अपवाद देना विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करता है और संविधान में दिए गए कानून के सामने समानता के अधिकार से जुड़ा सवाल खड़ा करता है।

दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला क्यों बना इस मामले में अहम?

मामले से जुड़ी एक याचिका दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई 2022 के बंटे हुए फैसले के खिलाफ है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की पीठ इस मुद्दे पर एकमत नहीं थी। न्यायमूर्ति शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को असंवैधानिक मानते हुए इसे हटाने के पक्ष में फैसला दिया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय दंड संहिता लागू होने के 162 साल बाद भी अगर किसी विवाहित महिला की न्याय की पुकार नहीं सुनी जाती है तो यह दुखद होगा। वहीं न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इस अपवाद को असंवैधानिक नहीं माना था और कहा था कि यह अलग कानूनी वर्गीकरण पर आधारित है। दोनों न्यायाधीशों ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की अनुमति दी थी, क्योंकि इसमें महत्वपूर्ण कानूनी सवाल जुड़े थे।

क्या दूसरे हाईकोर्ट ने भी पति को मिली छूट पर सवाल उठाया?

कर्नाटक हाईकोर्ट पहले ही कह चुका है कि पति को पत्नी के साथ दुष्कर्म और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 यानी कानून के सामने समानता के सिद्धांत के खिलाफ जाता है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं में भी पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। अब नए भारतीय न्याय संहिता में भी समान अपवाद मौजूद होने के कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि विवाह के आधार पर पति को दी गई यह कानूनी सुरक्षा संविधान की कसौटी पर टिकती है या नहीं।

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