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‘चाय वाले’ के स्वागत में उजाड़ दी गईं चाय वालों की दुकानें

Sat, 11 Jun 2016 04:47 AM IST
यश मालवीय/अमर उजाला, इलाहाबाद
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- फोटो : Reuters
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‘चाय अपने बीच थी तो क्या नहीं था, एक चिथड़ा सुख यहीं पर था, यहीं था’ लेकिन शुक्रवार को ऐसा नहीं रहा। पत्थर गिरजाघर से एजी ऑफिस चौराहा और थार्नहिल रोड के पास के दफ्तरों में काम करने वाले लोग लंच टाइम में निकले तो बाहर सन्नाटा पसरा था। पता चला कि एक चाय वाले के स्वागत में चाय वालों की दुकानें उजाड़ दी गई हैं। हम दफ्तर में काम करने वाले लोग, चार-पांच रुपये की चाय में दिन बिताने वाले लोग तब बेबस और निरीह से दिखे जब ऑफिस से बाहर चाय की दुकानें उजड़ी दिखीं।
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हमें तो अपने चाय बेचने वाले प्रधानमंत्री पर नाज था। लगता था कि सारे टी स्टाल सहित चाय बेचने और पीने वाले सुरक्षित हैं लेकिन यहां तो दफ्तर के बाहर का मंजर ही अजीब था। चाय वाले पीएम के होते हुए चाय वाले डरे-सहमे हुए थे। उन्हें लग रहा था कि अगर आज एक प्याली चाय भी बेची तो कल की रोजी दांव पर लग जाएगी। एजी ऑफिस के बाहर चाय की दुकानों पर जीवन तरंगित होता है। चाय हमारे बीच एक सेतु की तरह है, जिसके बहाने मिल बैठकर अपने दुखड़े कह-सुन कर हल्के हो लेते हैं।

चाय की चुस्कियों के बीच साथियों से घर या दफ्तर के तनाव साझा करके उससे निजात पा लेते हैं, इसी चाय से दोपहर की कड़ी धूप से लड़ लेते हैं लेकिन आज ऐसा नहीं था आम आदमी से उसका टी टाइम छीन लिया गया था। दफ्तर के बाहर एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। यह वही इलाहाबाद है, जहां मेरे कवि पिता उमाकांत मालीवय कहते थे, ‘एक चाय की चुस्की, एक कहकहा, अपना तो इतना सामान ही रहा।’ फिलहाल ‘चाय वाले’ के आने और जाने तक यह चाय की चुस्की मृगतृष्णा ही रहेगी। एक चाय वाले के स्वागत में चाय वालों की दुकानें उजाड़ दी गई हैं।
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