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Manmohan Singh: वित्त मंत्री बनने के ऑफर पर नहीं हुआ था भरोसा, शपथ ग्रहण के दिन UGC कार्यालय पहुंचे थे मनमोहन

Sat, 28 Dec 2024 06:18 AM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

देश 1991 में गंभीर मुद्रा संकट से जूझ रहा था...सिर्फ दो हफ्ते के आयात के बराबर ही विदेशी मुद्रा भंडार बचा था...देश का सोना गिरवी था...ऐसे विकट हालात में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने और आर्थिक सुधारों के जरिये इतिहास रच दिया। नियंत्रित अर्थव्यवस्था को लाइसेंस राज से मुक्त किया। उदारीकरण शुरू किया। विदेशी निवेश के रास्ते खोले।
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मनमोहन सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जून, 1991...यूजीसी के चेयरमैन मनमोहन सिंह नीदरलैंड में एक कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के बाद दिल्ली लौटे...देर रात उनके दामाद विजय तन्खा के पास एक फोन आया और मनमोहन को जगाने का आग्रह किया। इस फोन कॉल ने न केवल मनमोहन सिंह की जिंदगी को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी हमेशा के लिए बदल दिया।

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यह फोन तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के विश्वासपात्र पीसी एलेक्जेंडर ने किया था। फोन के कुछ घंटों बाद मनमोहन और एलेक्जेंडर की मुलाकात हुई। एलेक्जेंडर ने कहा कि राव उन्हें देश का वित्त मंत्री बनाना चाहते हैं। राजनीति से दूर-दूर तक वास्ता न रखने वाले मनमोहन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन राव उन्हें लेकर बहुत गंभीर थे। मनमोहन की बेटी दमन सिंह की किताब ‘स्ट्रिक्टली पर्सनल, मनमोहन एंड गुरशरण’ के अनुसार, 21 जून 1991 को मनमोहन अपने यूजीसी कार्यालय में थे। उनसे घर जाने और तैयार होकर शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचने को कहा गया। शपथ लेने वालों की नई टीम के सदस्य के रूप में मनमोहन को देखकर हर कोई हैरान था। औपचारिक रूप से पद का आवंटन बाद में हुआ, लेकिन राव ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि उन्हें वित्त मंत्री बनाया जा रहा है।

आर्थिक सुधारों के प्रणेता
दो हफ्ते का ही बचा था विदेशी मुद्रा भंडार मनमोहन अर्थव्यवस्था को लाए पटरी पर

वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन की नियुक्ति से देश की अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल गई। भारत एकाकी, भारी नियंत्रण, कम विकास वाली अर्थव्यवस्था से आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था में शुमार हो चुका है। राव के साथ मनमोहन 1991 के सुधारों के वास्तुकार, प्रणेता थे।

  • विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 2,500 करोड़ रुपये रह गया था, जो 2 हफ्ते के आयात को पूरा करने के लिए ही था। वैश्विक बैंक लोन देने से मना कर रहे थे, लेकिन मनमोहन की रणनीति से अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी।

लाइसेंस राज से आजादी...विदेशी निवेश के रास्ते खोले

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मनमोहन ने आरबीआई के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर सी रंगराजन के साथ मिलकर रुपये का अवमूल्यन किया और तत्कालीन वाणिज्य मंत्री पी. चिदंबरम के साथ साझेदारी में निर्यात नियंत्रण हटा दिया। भारतीय अर्थव्यवस्था को लाइसेंस-परमिट राज से आजादी भी दिलाई। इससे उद्योगों में सरकारी हस्तक्षेप कम हुआ। विदेशी निवेश के रास्ते खुले। सरकारी कंपनियों में भी निजी निवेश को बढ़ावा दिया गया।

सेबी की स्थापना...कंपनियों को धन जुटाने की स्वतंत्रता दी
मनमोहन के पहले बजट ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की स्थापना का रास्ता साफ किया और कंपनियों को धन जुटाने की स्वतंत्रता दी। वित्तीय सुधारों के लिए आरबीआई गवर्नर एम. नरसिम्हन की अगुआई में समिति बनाई गई।

अपने नेताओं की नाराजगी के बावजूद फैसलों पर रहे अडिग
मनमोहन को 1991 का बजट स्वीकार कराने के लिए काफी मुश्किलें आईं। बॉम्बे क्लब नाम के कॉरपोरेट समूह ने विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा की मांग की, लेकिन सिंह ने ऐसा नहीं किया। उन्हें व्यापक सुधारों को पचा न पाने वाले कांग्रेस नेताओं की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपनी किताब ‘टू द ब्रिंक एंड बैक : इंडियाज 1991 स्टोरी’ में लिखा कि बजट पेश होने के बाद 25 जुलाई, 1991 को मनमोहन बिना किसी पूर्व योजना के प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित हुए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके बजट का संदेश अधिकारियों की उदासीनता के कारण विकृत न हो जाए। कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में पार्टी के दबाव में झुकते हुए मनमोहन ने उर्वरक की कीमतों में 40 प्रतिशत की वृद्धि को घटाकर 30 प्रतिशत करने पर सहमति जताई, लेकिन एलपीजी तथा पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि को यथावत रखा था। यह दोनों पक्षों की जीत थी। यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का सर्वोत्तम रचनात्मक उदाहरण है।

सीतारमण बोलीं- 1991 का बजट मील का पत्थर
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह दूरदर्शी नेता थे। उनका 1991 में पेश बजट मील का पत्थर था, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाया।
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