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Manipur: SC ने कहा- आधिपत्य का संदेश देने के लिए यौन हिंसा का इस्तेमाल करती भीड़, राज्य इसे रोकने को बाध्य

Fri, 11 Aug 2023 02:16 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि महिलाओं को यौन अपराधों और हिंसा का शिकार बनाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि यह गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता के संवैधानिक मूल्यों का गंभीर उल्लंघन है।
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मणिपुर में महिलाओं के खिलाफ यौन हमले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भीड़ दूसरे समुदाय को अपने आधिपत्य का संदेश देने के लिए यौन हिंसा का इस्तेमाल करती है और राज्य इसे रोकने के लिए बाध्य है। शीर्ष अदालत ने अपने द्वारा गठित सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय समिति से चार मई से मणिपुर में महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा की प्रकृति की जांच करने को भी कहा।

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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि महिलाओं को यौन अपराधों और हिंसा का शिकार बनाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। पीठ में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि यह गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता के संवैधानिक मूल्यों का गंभीर उल्लंघन है। पीठ ने कहा, भीड़ आमतौर पर कई कारणों से महिलाओं के खिलाफ हिंसा का सहारा लेती है, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि यदि वे एक बड़े समूह के सदस्य हैं तो वे अपने अपराधों के लिए सजा से बच सकते हैं। आदेश में कहा गया कि सांप्रदायिक हिंसा के समय, भीड़ उस समुदाय को अपने आधिपत्य का संदेश देने के लिए यौन हिंसा का इस्तेमाल करती है जिससे पीड़ित या बचे हुए लोग संबंधित होते हैं।

पीठ ने अपने सात अगस्त के आदेश में कहा, संघर्ष के दौरान महिलाओं के खिलाफ इस तरह की भयानक हिंसा एक अत्याचार के अलावा और कुछ नहीं है।यह राज्य का परम कर्तव्य है, यह उसका सबसे बड़ा कर्तव्य है कि लोगों को ऐसी निंदनीय हिंसा करने से रोकना और उन लोगों की रक्षा करना जिन्हें हिंसा निशाना बनाती है। पीठ के आदेश को गुरुवार रात को अपलोड किया गया।
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गौरतलब है कि तीन मई को राज्य में पहली बार जातीय हिंसा भड़कने के बाद से 160 से अधिक लोग मारे गए हैं और कई सौ घायल हुए हैं। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस के लिए आरोपी व्यक्ति की शीघ्र पहचान करना और उसे गिरफ्तार करना महत्वपूर्ण है क्योंकि जांच पूरी करने के लिए उनकी जरूरत पड़ सकती है। यह रेखांकित करते हुए कि सांप्रदायिक संघर्ष के कारण आवासीय संपत्ति और धार्मिक स्थलों को भी बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है, शीर्ष अदालत ने कहा कि वह अपने संवैधानिक दायित्व को निभाते हुए कदम उठाने के लिए बाध्य है।

पीठ ने कहा, इसके अलावा आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ या उन्हें नष्ट करने, गवाहों को डराने और अपराध स्थल से भागने का प्रयास कर सकता है। बिना किसी कारण के आरोपी की पहचान और गिरफ्तारी में काफी देरी को अदालत द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, इस अदालत की यह भी राय है कि उसका हस्तक्षेप पुनरावृत्ति न होने की गारंटी की दिशा में एक कदम होगा। पीठ ने कहा, जो उपाय बताए गए हैं उनके बारे में अदालत को लगता है कि वे सभी समुदायों के लिए किए जाएंगे और उन सभी लोगों के साथ न्याय किया जाएगा, जो सांप्रदायिक हिंसा में (किसी भी तरह से) हताहत हुए हैं। 

पीठ ने कहा, हिंसा के पीड़ितों को उपचारात्मक उपाय प्राप्त होने चाहिए चाहे और इससे फर्क नहीं पड़ता कि वे किस समुदाय के हैं। इसी तरह, हिंसा के अपराधियों को हिंसा के स्रोत की परवाह किए बिना जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों सहित कई गंभीर आरोप हैं, जो दर्शाते हैं कि कानून लागू करने वाली मशीनरी हिंसा को नियंत्रित करने में नाकाम रही है और कुछ स्थितियों में, अपराधियों के साथ मिली हुई है।

पीठ ने कहा, उचित जांच के अभाव में, यह अदालत इन आरोपों पर कोई तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं निकालेगी। लेकिन, कम से कम ऐसे आरोपों के लिए वस्तुनिष्ठ तथ्यान्वेषण की आवश्यकता है। जो लोग सार्वजनिक कर्तव्य के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें समान रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, भले ही उनकी रैंक, स्थिति या पद कुछ भी हो। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य का प्रत्येक अधिकारी या कर्मचारी जो न केवल संवैधानिक और आधिकारिक कर्तव्यों की अवहेलना का दोषी है, बल्कि अपराधियों के साथ मिलकर खुद अपराधी बनने का भी दोषी है, उसे हर हाल में जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा, यह न्याय का वादा ही है जिसकी मांग संविधान इस अदालत और राज्य की सभी इकाइयों से करता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि हिंसा रुके, हिंसा के अपराधियों को दंडित किया जाए और न्याय प्रणाली में समुदाय का विश्वास और भरोसा बहाल हो, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के तीन पूर्व न्यायाधीशों की एक समिति गठित की है। इस समति में जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गीता मित्तल, बंबई उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शालिनी फणसलकर जोशी और दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आशा मेनन शामिल हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि तीन सदस्यीय समिति का काम सभी उपलब्ध स्रोतों से मणिपुर में चार मई से महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा की प्रकृति की जांच करना होगा, जिसमें जीवित बचे लोगों के साथ व्यक्तिगत बैठकें, बचे लोगों के परिवारों के सदस्य, स्थानीय या समुदाय प्रतिनिधि, राहत शिविरों के प्रभारी अधिकारी और दर्ज प्राथमिकियों के साथ-साथ मीडिया में आई खबरें शामिल हैं। पीठ ने कहा कि समिति दुष्कर्म के आघात से निपटने, समयबद्ध तरीके से सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक सहायता, राहत और पुनर्वास प्रदान करने सहित पीड़ितों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदमों पर भी एक रिपोर्ट भी सौंपेगी।

यह निर्देश देते हुए कि जांच की प्रक्रिया की निगरानी शीर्ष अदालत द्वारा की जाएगी। पीठ ने महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक दत्तात्रेय पडसलगीकर को सीबीआई के पास स्थानांतरित की गई प्राथमिकियों की जांच और राज्य की जांच मशीनरी द्वारा शेष प्राथमिकियों की जांच की निगरानी करने के लिए नियुक्त किया।

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