सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेना और अर्धसैनिक बलों को मणिपुर में प्रतिशोध के तौर पर जरूरत से अत्यधिकबल का प्रयोग नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अशांत इलाके में अगर कोई व्यक्ति हथियार रखता है तो महज इस आधार पर उसे दुश्मन नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने कहा कि सशस्त्र सेना के सदस्यों को सिर्फ आरोप या संदेह केआधार पर किसी व्यक्ति को शत्रु मानकर उसे मारने की इजाजत नहीं देता। अदालत ने कहा कि ऐसा न केवल कानून के शासन के लिए खतरनाकर है बल्कि यह लोकतंत्र के लिए घातक है।
शीर्ष अदालत ने मणिपुर में कथित तौर पर हुए 1528 फर्जी एनकाउंटर की विस्तृत जानकारी मांगी है। पीठ ने संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सशस्त्र बलों के कारण होने वाली मौत के बारे में किसी तरह की शिकायत आती है या अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल करने का आरोप लगता है तो इसकी जांच आवश्यक है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को आंतकी या विद्रोही तभी करार दिया जाना चाहिए जब उसकेखिलाफ सबूत मिले। अशांत इलाकों में अगर कोई हथियार रखता है तो नियम केखिलाफ जरूर है लेकिन उसे आतंकी या विद्रोही नहीं करार दिया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 के तहत सेना मुख्यालय द्वारा जारी निर्देश 'क्या करें और क्या न करेंÓ का पालन करने के लिए कहा है। यह अधिनियम सशस्त्र बलों को अत्यधिक बल केइस्तेमाल से रोकता है।
पीठ ने कहा कि हम यहां यह साफ करने की जरूरत है कि मणिपुर में कभी भी युद्ध या बाहरी आक्रमण या सेना में विद्रोह जैसी स्थिति नहीं है जिससे देश या देश केकिसी हिस्से को खतरा है। अभी तक भारत सरकार द्वारा इस तरह की घोषणा नहीं की गई है।