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मंगलेश डबराल की डायरी: हम अपनी कविता के रसोईघर को ही कविता मान लेते हैं

Thu, 10 Dec 2020 06:33 AM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मंगेश डबराल
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कविता में कभी अच्छा मनुष्य दिख जाता है या कभी अच्छे मनुष्य में कविता दिख जाती है। कभी-कभी एक के भीतर दोनों ही दिख जाते हैं। यही एक बड़ा प्रतिकार है। और अगर यह ऐसा युग है जब कविता में बुरा मनुष्य भी दिख रहा है तब तो कविता में अच्छा मनुष्य और भी ज्यादा दिखेगा। लेकिन क्या ऐसा भी समय आ सकता है कि अच्छे साहित्य की चर्चा ही न हो? सिर्फ दोयम दर्जे की कविता-कहानी को महान, अभूतपूर्व, युगांतकारी माना जाने लगे? कोई बहुत अच्छी कविता कहीं छपे और लोग उस पर कोई बात न करें और चुप लगा जाएं। यह कितना भयानक होगा। लेकिन समय की विशाल छलनी भी तो कुछ छानती रहती है। चुपचाप।

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नेता, इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए, सूचना तकनीक के माहिर लोग, सॉफ्टवेयर निर्माता, पत्रकार, प्रशासक, नौकरशाह, चित्रकार, संगीतकार, नृत्यकार वगैरह प्राय: राज्य, सत्ता, बा?ार और ग्लोबलाइजेशन के अनुरूप ही सोचते हैं। वे यथास्थिति के विरोध में नहीं जाते। प्राय: कवि-लेखक-बुद्धिजीवी हैं जो सत्ताओं के प्रतिकूल सोचते हैं। इसके अपवाद जरूर हैं, इसलिए हम उन्हें हमेशा याद रखते हैं। माइकल एंजेलो वेटिकन के पोप को अपने से बड़ा नहीं समझता, इकबाल बानो पकिस्तान में याह्या खान की हुकूमत के खिलाफ फैज की नज्म गाती हैं, जर्मनी में कई कलाकार हिटलर के खिलाफ पेंटिंग करते हैं, बीठोफेन नेपोलियन के विरोध में उसे पहले समर्पित की हुई अपनी सिंफनी फाड़ डालता है। 

पोलैंड के महान पियानोवादक लिस्त के बारे में एक कहानी प्रसिद्ध  है कि एक बार उसके संगीत कार्यक्रम में रूस के जार निकोलस सपरिवार अगली कतार में बैठे हुए थे। पोलैंड तब रूस के अधीन था। लिस्त बजा रहे थे और जार परिवार बातों में मशगूल था। उन्हें बातें करते देख लिस्त ने पियानो बजाना बंद कर दिया, लेकिन जार ने उनसे कहा कि बजाते जाइए। यह क्रम तीन बार चला। चौथी बार लिस्त ने पियानो बंद किया और व्यंग्य से कहा कि जब जार बोल रहे हों तो हर चीज को खामोश हो जाना चाहिए। ऐसे कलाकार अमर हैं, क्योंकि वे कला का नैतिक मूल्य समझते हैं और बादशाहों-तानाशाहों को कुछ नहीं समझते। अब्दुल हलीम शरर की किताब, 'गुजिश्ता लखनऊ' में नवाब हैदर खां का किस्सा कितना मशहूर है। इस किस्से को स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए।
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राजनैतिक कविता के नाम पर ज्यादातर जो कुछ दिखाई देता है वह शायद किसी बड़ी कविता को निर्मित कर सकनेवाला कच्चा माल है। यह हम मार्क्सवादी कवियों  की एक खामी है कि हम कविता की सामग्री को कविता की तरह पेश करते रहते हैं और गैर-कलावादी बनते हैं। हम अपनी कविता के रसोईघर को ही कविता मान लेते हैं, ताकि भोजन की असलियत भी पता चल जाए। हम अपनी किचन आपको पूरा क्यों दिखाएं? थोड़ा बहुत दिखाएंगे, लेकिन यह भी बताएंगे कि बहुत कम चीजों से हम बहुत अच्छा खाना बनाते हैं। यही हमारी कला है। और कला हमारी ही है, किन्हीं कलावादियों की नहीं।
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( ये प्रविष्टियां शीघ्र प्रकाश्य गद्य पुस्तक 'कवि का अकेलापन' से )

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