फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मर्द बोले तलाक, बीवी को अदालत के चक्कर'

Tue, 14 Jun 2016 06:01 PM IST
सलमान रावी/ बीबीसी संवाददाता
विज्ञापन
Muslim women - फोटो : BBC
विज्ञापन
मारिया बेगम की शादी 29 साल की उम्र में हो गयी थी। हालांकि शुरू से ही पति-पत्नी के संबंधों में दरार आ गई, मारिया हमेशा पति के साथ ही रहना चाहती थी। मगर एक दिन उन्हें तब झटका लगा जब पति ने तलाक देने की घोषणा कर दी। उन्होंने इस्लामी संस्था 'दारुल क़ज़ा' का दरवाजा खटखटाया मगर वहां मौजूद काज़ी ने कह दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता और तलाक वैध है।
विज्ञापन


मारिया को मेहर भी नहीं दिया गया और उन्होंने अब न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया क्योंकि 'मुस्लिम पर्सनल लॉ' के तहत बनाए गए 'दारुल क़ज़ा' से उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाया। उनका कहना है कि उनके जैसी महिलाओं को इस तरह की सामाजिक संस्थाओं से न्याय नहीं मिल सकेगा इसलिए इन मामलों का निपटारा अदालतों में ही होना चाहिए और इसके लिए कानून भी होना चाहिए।

फरजाना (बदला हुआ नाम) का निकाह 21 साल की उम्र में हुआ और अब उनका एक आठ साल का बेटा है। शादी के चार महीनों के अंदर ही उनका पति काम करने सऊदी अरब चला गया।
विज्ञापन

जब वो दो साल के बाद लौटा तो उसने अपनी बीवी के जेवर गिरवी रख दिए और एक कार खरीद ली। वो वापस सऊदी अरब चला गया।

फिर लंबे समय तक ना उसका कोई फोन आया और ना ही कोई चिठ्ठी। फर्ज़ाना अपने बेटे के साथ रोज उसका इंतजार करती रही। मजबूर होकर वो काज़ी के पास पहुंचीं जिन्होंने फरज़ाना के पति से फोन के जरिए संपर्क किया।

फरज़ाना के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था जब क़ाज़ी साहब ने बताया कि उनके पति ने उन्हें तलाक दे दी है।

Muslim women - फोटो : BBC
मगर फरज़ाना के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था जब क़ाज़ी साहब ने बताया कि उनके पति ने उन्हें तलाक दे दी है। काज़ी साहब ने यह भी कहा कि अगर वो अपने बेटे को पति के हवाले कर दें तो वो उन्हें मेहर देने को तैयार हो सकते है।

आश्चर्यजनक रूप से काज़ी साहब ने वो कागज भी निकाल लिया जिसमें तलाक की बात कही गई थी। फरज़ाना का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वो ऐसा कानून बनाये ताकि धर्म की आड़ में इस तरह के एक तरफा फैसले कोई ना ले पाये। ये सिर्फ दो अकेले मामले नहीं है। मुस्लिम समाज को अपनी महिलाओं को लेकर एक बड़ी चिंता सता रही है।

चिंता उनके भविष्य की और उनकी सामाजिक सुरक्षा की। हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के बीच काम कर रही एक संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक प्रतिवेदन दिया और मांग की है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ समाज में हो रहे लिंग भेद को समाप्त करने के लिए कानून बनाया जाए। संस्था ने मांग की है कि मुस्लिम महिलाओं के हितों को देखते हुए 1936 से चले आ रहे मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करना अब जरूरी हो गया है।

संस्था ने इस प्रतिवेदन की प्रतियां विधि आयोग से लेकर अल्संख्यक आयोग तक को भेजी है और कहा है कि 1985 में शाह बानो के मामले के बाद से ही कुछ 'पुरूष प्रधान सोच वाले' लोगों और धर्म की अगुवाई करने का दावा करने वाले लोगों ने 'मुस्लिम पर्सनल लॉ' में किसी तरह के भी बदलाव लाने में 'हमेशा अड़चन' ही पैदा की है।
विज्ञापन

मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बांग्लादेश में पारिवारिक, शादी-ब्याह और उत्तराधिकार के मामलों को संहिताबद्ध कर दिया गया है

Muslim women - फोटो : BBC
 संगठन की ज़किया सोमन ने कहा है कि मुस्लिम देशों में भी शादियों और पारिवारिक मामलों के लिए कानून को संहिताबद्ध कर दिया गया है। मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बांग्लादेश में पारिवारिक, शादी-ब्याह और उत्तराधिकार के मामलों को संहिताबद्ध कर दिया गया है जबकि यहां 'मुस्लिम समाज के स्वम्भू नेता' इसे होने नहीं दे रहे है वो कहती हैं कि "मुस्लमान मर्द तो तीन बार तलाक कहकर निकल लेता है।

मगर मुसलमान औरत को अगर तलाक चाहिए तो उसे अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। समाज पुरूष प्रधान होता चला जा रहा है और औरत के खिलाफ दारुल कज़ा के काज़ी फैसले सुनाते चले जा रहे है। उनके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं और समाज में कोई बोलने वाला नहीं है। इसलिए मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा जरूरी है और एक नया कानून भी जरूरी है जो औरतों को बराबरी दे।"

प्रधानमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में प्रमुख मांगे मेहर शहर की एक साल की आय के बराबर हो मौखिक तलाक को अवैध घोषित किया जाए तलाक से पहले सुलह की कोशिश के लिए 90 दिनों की मोहलत पत्नी नौकरी करने वाली ही क्यों ना हो, तलाक की सूरत में उसे गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी पति की होनी चाहिए।

एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह गैर कानूनी घोषित किया जाना चाहिए माँ और पिता को बच्चों पर बराबर का अधिकार हलाला और मुत्ता शादियां अवैध घोषित की जाएं संपत्ति में बेटियों को बराबरी का हक तलाक और दुसरे निकाह में गलत फतवों और फैसलों के लिए काजियों को भी दोषी ठहराया जाए।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें