लोकसभा चुनाव 2019 के हर चरण में पश्चिम बंगाल से भारी हिंसा की खबरें आती रहीं। चुनावी हिंसा के दौरान कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। केंद्रीय रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने चिंता व्यक्त की है कि चुनाव खत्म होने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को वोट न देने वाले मतदाताओं के ऊपर नरसंहार जैसी हिंसा हो सकती है। इस बीच हमारे विशेष संवाददाता अमित शर्मा ने बंगाल से ताल्लुक रखनेवाले वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता से बंगाल की राजनीति के कई मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। पेश है वार्ता के प्रमुख अंश -
स्वप्न दासगुप्ता जी, पूरे चुनाव में अकेले पश्चिम बंगाल से ही भारी हिंसा की खबरें आईं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और टीएमसी दोनों ने हिंसा के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाए हैं। हिंसा के पीछे आप क्या कारण देखते हैं?
हां, आप सही कह रहे हैं। पूरे देश में जब चुनावी हिंसा लगभग खत्म हो गई है, बंगाल की राजनीति में भारी हिंसा का होना भद्रलोक बंगाल के लिए ठीक नहीं है। दरअसल, पूरी हिंसा के पीछे कारण यह है कि तृणमूल कांग्रेस बंगाल की जमीन पर भाजपा के उभार को पचा नहीं पा रही है। उन्होंने पंचायत चुनाव में किसी का नामांकन नहीं होने दिया। हिंसा के दम पर पंचायत चुनाव में भाजपा को रोक दिया। वे अब भी वही करना चाहते हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा काडर विरोध कर रहा है जिसके कारण वे हिंसा करने पर उतारू हैं। यहां दिल्ली में बैठकर आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि बंगाल में कितनी ज्यादा हिंसा है, मार-काट है। ममता दीदी को समझना पड़ेगा कि अगर वामदलों की हिंसा उन्हें सत्ता में आने से नहीं रोक पाई, तो अब भाजपा को भी हिंसा से नहीं रोका जा सकता। बेहतर होगा कि वे जनता का मानस समझें और अपनी राजनीति में परिवर्तन करें।
वामदलों के समय से ही पश्चिम बंगाल हिंसा के लिए बदनाम रहा है। क्या कारण है कि स्थिति सुधरने की बजाय और बिगड़ती दिख रही है?
वामदल तो फिर भी एक नियम-कायदे से बंधे थे। कुछ करने के पहले बात सुनते थे। अगर लोग उनकी बात मान जाते थे तो वे हिंसा भी नहीं करते थे। लेकिन टीएमसी ने उस हिंसा को भी बेलगाम कर दिया है। बंगाल की छोटी से छोटी चीज में भी टीएमसी कार्यकर्ताओं की गुंडेगर्दी चलती है। समय के साथ जनता में टीएमसी के लिए बड़ा गुस्सा पैदा हो रहा है जिसे ममता बनर्जी समझ नहीं रही है। उनका यह गुस्सा मतदान के रूप में बाहर आएगा और टीएमसी के लिए भारी पड़ेगा। इसीलिए कह रहा हूं कि ममता दीदी को अपनी राजनीति पर दोबारा विचार करना चाहिए।
हर चरण के बाद भाजपा-तृणमूल कांग्रेस दोनों ने ही चुनाव आयोग से शिकायत की, लेकिन आयोग हिंसा रोकने में असफल रहा। चुनाव आयोग पर पक्षपात करने का भी आरोप लगा। आप क्या कहेंगे?
देखिए, चुनाव आयोग एक सीमा से अधिक कुछ नहीं कर सकता। उसके पास अपनी मशीनरी नहीं होती। उसे हर काम के लिए राज्य सरकार की मशीनरी या केंद्र के सुरक्षा बलों पर भरोसा करना होता है। हिंसा के कारण एक दिन पहले चुनाव प्रचार खत्म करना पड़ा जो हिंदुस्तान के इतिहास में इसके पहले कभी नहीं हुआ। दरअसल, जब तक राजनीतिक दल स्वयं हिंसा को बढ़ावा देना बंद नहीं करेंगे, इसे रोकना संभव नहीं है। जहां तक पक्षपात की बात है तो यह राजनीतिक स्टंट ज्यादा होता है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। हमारे देश का चुनाव आयोग अनेक देशों के लिए आदर्श की तरह बना हुआ है। हमें भी उसका मान बढ़ाने के लिए बात करनी चाहिए।
इस बार यह भी पहली बार देखने में आया कि ममता बनर्जी ने केंद्रीय बलों पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगा दिया? आखिर भरोसा किस पर करेंगे?
यह बेहद आपत्तिजनक बात है। हमारे सैनिकों, सुरक्षाबलों पर कभी शक की अंगुली नहीं उठाई गई, लेकिन अब ऐसा हो रहा है जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बात है। ममता बनर्जी जिस तंत्र से लड़कर आई हैं वे जानती हैं कि क्या सच है और क्या गलत है। इसलिए हिंसा न रोकने की अपनी असफलता वे सुरक्षा बलों पर नहीं थोप सकतीं।
भाजपा के लिए इस बार लोकसभा चुनाव में आप क्या संभावनाएं देख रहे हैं?
दो-चार दिन और ठहर जाइये। अब तो जनता का निर्णय आने ही वाला है। कुल मिलाकर मैं इतना ही कह सकता हूं कि एक बड़े बदलाव की नींव रखी जा चुकी है। भाजपा बड़ी जीत हासिल करेगी। बड़ा परिवर्तन पश्चिम बंगाल की राजनीति में दिखने वाला है। भाजपा ने आज यहां प्रमुख विपक्षी दल की जगह हथिया ली है। आगे की मंजिल अभी दूर है।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी दलों के लिए आप क्या संभावना देख रहे हैं?
ममता दीदी के अलग होने से बंगाल में कांग्रेस लगभग खत्म सी हो गई है। वे स्वयं को मजबूत करने के लिए कोई बड़ा प्रयास करते भी नहीं दिख रहे हैं। पार्टी संगठन पूरे बंगाल में टूट गया है, उसे मजबूत करने की कोई अच्छी कोशिश भी होती नहीं दिख रही है। आज कांग्रेस केवल मालदा और मुर्शिदाबाद में मजबूत है और उसके लिए संभावनाएं भी वहीं से हैं। बिना जमीनी ठोस काम किए कांग्रेस का बंगाल में उभार संभव नहीं है।
वामदलों के लिहाज से पश्चिम बंगाल में अब क्या उम्मीदें हैं?
देखिए, नेताओं की बात छोड़िए। सामान्य वाम दल समर्थक के लिए उसकी लड़ाई भाजपा से नहीं, टीएमसी से है। वह टीएमसी को किसी भी कीमत पर हराना चाहता है। यही कारण है कि युक्तिपूर्वक कुछ सीटों पर वाम समर्थक भी भाजपा को वोट करेगा। इस कारण से मैं वामदलों को इस चुनाव में और पिछड़ता देख रहा हूं। जादवपुर और डायमंड हार्बर में ही उनकी लड़ाई मजबूत है। बाकी पूरे बंगाल में टीएमसी की लड़ाई भाजपा या कांग्रेस से है।