पोषण क्या होता है, इन्हें नहीं पता। इनके लिए भूख बड़ी है। अशिक्षा है और जागरूकता की कमी है। कम उम्र में शादी और फिर लगातार बच्चे। न मां पोषित न बच्चे। कुपोषण को ऊपरी हवा समझने लगते हैं। एनआरसी इनके लिए दूर और काल कोठरी है। गर्भवती की फिक्र नहीं तो बच्चा कैसे स्वस्थ होगा। यह हाल है उन परिवारों का जिनके बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
वहीं, सरकार का खाद्यान्न (पहले पोषाहार) ऊंट के मुहं में जीरा है। वह भी वक्त पर आता नहीं, कइयों तक पहुंचता भी नहीं। जिला अस्पताल का पोषण पुनर्वास केंद्र तो बस जैसे तैसे चल रहा है।
घर के आंगन में अपने आठ बच्चों के साथ चारपाई पर बैठी नाजरीन महज 32 साल की है। कहती है, मैं 14 साल की थी, जब मेरी शादी हुई। सातवें नंबर का तीन साल का चाहत लाल बच्चा (अति कुपोषित) है। इससे छोटा डेढ़ साल का मेरी गोद में है। जो पोषाहार मिलता है, वह तो बस दो दिन चलता है।
पावली खुर्द की नाजरीन की ही तरह हिना का हाल है। 18 माह की बेटी हिदा को लेकर मकबरा डिग्गी से एनआरसी आई है। बताती है, मैं 20 साल की हूं। यह तीसरा बच्चा है। शादी कम उम्र में हो गई थी। बच्ची को कुछ खाया पिया लग नहीं रह था तो चिकित्सक को दिखाया। पता चला कुपोषण का शिकार है। आंगनबाड़ी नहीं आती है। न ही अनाज, दाल और चावल आता है।
जेवरी गांव की शशि का दूसरा बेटा मानव अतिकुपोषित है। सवा चार साल का है, मगर दिखता दो साल जैसा है। उसके दाहिने हाथ की चार उंगलियां आपस मे जुड़ी हुई हैं। शशि कहती है, जब हुआ था तबसे ही ऐसा है। डॉक्टर को दिखाया था, उंगलियों का ऑपरेशन बताया है। इसे कुछ खाया पिया लगता नहीं हैं। गेहूं और चावल तो इस बार आए थे, मगर दाल नहीं मिली।
गांव बहचौला में सात माह के अतिकुपोषित सनी की मां मंजू घर के पास ही आंगनबाड़ी केंद्र पर धूप सेंक रही है। गोद में सनी है। मंजू कहती है, पहला बच्चा है। मुझ पर और सनी पर ऊपरी हवा है। डेड़ माह भभूत उतरवाई, पर पूरी तरह से हवा उतरी नहीं। पास बैठी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कविता बताती है, मंजू को दूध नहीं उतरता था, बेटे को मिला नहीं तो कमजोर रह गया। एनआरसी भी ले गए, मगर दूर होने के कारण इसने भर्ती नहीं किया।
इंचौली में तीन अति कुपोषित बच्चे थे। 20 माह की सारा, दो साल का हिमांशु और 31 माह की सिदरा। सारा की मां सबीहा को पता ही नहीं कि बेटी अति कुपोषित है। कहती है, पेट खराब रहता है इसका। दूध में गुड़ दे देती हूं तो ठीक हो जाती है। एनआरसी भी ले गए थे, दूर है, इसलिए नहीं रखा वहां।
सिदरा की मां फातिमा घर के बाहर नहीं आई, अपने जेठ के लड़के की गोद में उसे बाहर भेजा। यहां की आंगनबाड़ी सबा परवीन ने बताया कि जब ये हुई तो बीमार थी। इसकी मां को टीबी हो गई थी। अपना दूध नहीं पिला सकी। हिमांशु की मां बबीता भी घर के बाहर नही आई, बड़ी बेटी के साथ उसे भेजा। देखने में ही काफी कमजोर लग रहा था, गुमसुम था। हालांकि उसकी बड़ी बहन राधा का कहना था कि कमजोर है, पर तबीयत पहले से ठीक है।