कुपोषण के खिलाफ जंग में सामाजिक बंदिशों की दीवार खड़ी है। गंगा से सटा पौने 19 लाख की आबादी वाला अमरोहा जिला इन्हीं बंदिशों की बेड़ियों में जकड़ा है। कहीं परिवार की प्रतिष्ठा खोने का डर है तो कहीं परिवार कामकाज छोड़कर अपने बच्चों का इलाज कराने को तैयार नहीं है। नतीजा जिले में 2,273 बच्चे अति कुपोषित और 9,699 कुपोषित हैं।
संपन्न परिवार कुपोषण पर बात करने से बचते हैं तो निचला तबका अपना कामकाज छोड़कर बच्चों का इलाज कराने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि कोरोना काल में भी गर्भवती और बच्चों की देखभाल के लिए पुष्टाहार का वितरण जारी है। आंगनबाड़ी केंद्र डोर-टू-डोर पुष्टाहार का वितरण कर रहे हैं, लेकिन इस बीमारी से लड़ने के लिए लोगों में सामाजिक चेतना और जागरूकता दिखाई नहीं देती है।
धनौरा तहसील के गांव पथरकुटी निवासी संगीता (26) पति चंद्रपाल के घर पहुंचे तो उनकी चार वर्षीय मासूम बेटी भावना बुखार पीड़ित थी। नन्ही बच्ची के हाथ में कैनूला लगा था। संगीता ने बताया कि हम दोनों (पति-पत्नी) विकलांग हैं। बच्ची को ज्यादा दूर लेकर नहीं जा सकते। इसलिए आसपास इलाज कर रहे हैं। संगीता कहती है कि आशा प्रेमवती लगातार कह रही है, लेकिन 14 दिन के लिए भर्ती कराएंगे तो घर पर पांच वर्षीय बड़ा बेटा और परिवार के अन्य लोग भी हैं। उनका खाना-पीना कौन बनाएगा।
यही स्थित अधिकांश कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों के परिवारों की है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर कार्यरत कार्यकर्ता कुपोषण मिटाने की दिशा में प्रयासरत हैं लेकिन परिवार बच्चों को पोषण पुुनर्वास केंद्र (एनआरसी) ले जाने को परिवार तैयार नहीं है। नौगांवा तगा की कार्यकर्ता सुषमा कहती है कि मेरे यहां के तीन परिवारों के बच्चे कुपोषित हैं। उन्हें हर महीने पुष्टाहार भी दे रही हूं लेकिन परिवार के लोग काम छोड़कर बच्चे को भर्ती कराने को राजी नहीं हैं। कोरोना काल में भी उनके घरों तक पुष्टाहार के पैकेट पहुंचाए हैं, जिससे की मां और बच्चे को पाैष्टिक आहार मिल सके।