बच्चों में कुपोषण की समस्या से निबटने के लिए यूनिसेफ ने ‘1000 दिन’ का विशेष अभियान शुरू किया है। इस योजना के तहत मां के गर्भ (नौ महीने या लगभग 270 दिन) से लेकर बच्चे के जन्म के आगे तक, कुल मिलाकर एक हजार दिन तक उसके पोषण का विशेष ध्यान रखना है।
यूनिसेफ का मानना है कि अगर इन 1000 दिनों में हम बच्चे के पोषण का विशेष ध्यान रखते हैं, तो उसके कुपोषित होने से बचाया जा सकता है। विद्वानों का मानना है कि जन्म के बाद शुरू के एक हजार दिन में होने वाले कुपोषण से बच्चे के आईक्यू स्तर (बौद्धिक स्तर) में 15 पॉइंट तक की कमी हो जाती है।
विद्वानों का मानना है कि एक बार इस कमी के हो जाने के बाद जीवन पर्यंत इस समस्या से उबरा नहीं जा सकता है। ऐसे बच्चों का शैक्षिक स्तर काफी कम रह जाता है। इतना ही नहीं, बाद में वयस्क के रूप में काम करने के दौरान भी उनकी उत्पादकता 10-15 फीसदी कम बनी रहती है।
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में कुपोषण के कारण प्रति वर्ष पांच वर्ष से कम आयु के दस लाख बच्चों की मौत हो जाती है। भारत के लिए यह चिंताजनक तथ्य है कि वह अपने पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल से भी कुपोषण और बाल मृत्यु दर के मामले में खराब स्थिति में है। भारत में मध्यप्रदेश, बिहार, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य कुपोषण में काफी अहम हैं।
कुपोषण पर भारत के सामाजिक ढांचे का भी स्पष्ट असर देखने को मिला है। एसीएफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अनुसूचित जनजाति में 28 फीसदी, अनुसूचित जाति में 21 फीसदी, पिछड़ी जातियों में 20 फीसदी और ग्रामीण समुदाय में 21 फीसदी बच्चों में कुपोषण देखने को मिलता है।