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ग्राउंड रिपोर्ट संत कबीर नगर: यहां मासूमों का वजन और लंबाई रह जाती है उम्र से आधी, कागजों पर ही चल रही सेहत की जंग

नीरज मिश्र, संत कबीर नगर Published by: देव कश्यप Updated Wed, 30 Dec 2020 02:05 AM IST
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बुड़ियापार गांव की रहने वाली संजू अपने डेढ़ साल के बेटे के साथ - फोटो : अमर उजाला

कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के दावे और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। पड़ताल से पता चला कि कुपोषण के खात्मे की जंग में अधिकारी और कर्मचारी भागीदार तो बन रहे हैं पर इसका असर कागजों तक सिमटा है। जन्म लेने वाले बच्चों का वजन औसतन सामान्य रहता है, लेकिन छह महीने बाद स्थिति बदल जाती है। बच्चों के वजन व लंबाई में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं होता है। यही माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता है। ऐसे सभी बच्चे एनआरसी (पोषण पुर्नवास केंद्र) और आंगनबाड़ी केंद्रों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

बघौली ब्लॉक के बुड़ियापार गांव की रहने वाली संजू अपने डेढ़ साल के बेटे देवानंद के वजन और लंबाई को लेकर परेशान हैं। घर के बरामदे में बैठी संजू कहती हैं, बेटा जब पैदा हुआ तो वजन साढ़े तीन किलोग्राम था। छह माह बाद वजन घट गया। चिंता बढ़ी और बेटे को लेकर सरकारी अस्पताल पहुंच गई। तब पता चला कि अतिकुपोषित है। देवानंद को 16 दिनों तक पोषण पुनर्वास केंद्र में रखा गया। इस बीच 300 ग्राम वजन बढ़ गया, लेकिन शारीरिक विकास की समस्या बनी रही। डेढ़ वर्ष की उम्र तक बैठ नहीं सका। अब बैठना शुरू किया है। अब वजन चार किलोग्राम है। लंबाई 65 सेंटीमीटर है।




इसी विकास खंड के लहरौली गांव की रहने वाली मारिया की बेटी एक साल छह माह की है। उसकी लंबाई 75 सेंटीमीटर और वजन चार किलो 800 ग्राम है। मारिया के मुताबिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मदद से बिटिया को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया है। जन्म के समय बिटिया का वजन ढाई किलोग्राम था। अचानक छह माह बाद वजन घटने लगा।

मुख्यालय से सटे बालूशासन गांव के उमेश की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है। उमेश का बेटा अभिषेक चार साल का हो गया है। जन्म के समय वह बिल्कुल स्वस्थ्य था, लेकिन एक साल बाद भी वजन नहीं बढ़ा। औसतन लंबाई भी नहीं बढ़ सकी। चार साल बाद बेटे का वजन 12 किलो 200 ग्राम है जबकि लंबाई 100 सेंटीमीटर के आसपास है। खास बात यह है कि अभिषेक की दादी खुद आंगनबाड़ी सहायिका हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि गांव में अन्य कुपोषित बच्चों की स्थिति कैसी होगी।

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बुड़ियापार गांव की रहने वाली संजू अपने डेढ़ साल के बेटे के साथ - फोटो : अमर उजाला
कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के दावे और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। पड़ताल से पता चला कि कुपोषण के खात्मे की जंग में अधिकारी और कर्मचारी भागीदार तो बन रहे हैं पर इसका असर कागजों तक सिमटा है। जन्म लेने वाले बच्चों का वजन औसतन सामान्य रहता है, लेकिन छह महीने बाद स्थिति बदल जाती है। बच्चों के वजन व लंबाई में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं होता है। यही माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता है। ऐसे सभी बच्चे एनआरसी (पोषण पुर्नवास केंद्र) और आंगनबाड़ी केंद्रों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

बघौली ब्लॉक के बुड़ियापार गांव की रहने वाली संजू अपने डेढ़ साल के बेटे देवानंद के वजन और लंबाई को लेकर परेशान हैं। घर के बरामदे में बैठी संजू कहती हैं, बेटा जब पैदा हुआ तो वजन साढ़े तीन किलोग्राम था। छह माह बाद वजन घट गया। चिंता बढ़ी और बेटे को लेकर सरकारी अस्पताल पहुंच गई। तब पता चला कि अतिकुपोषित है। देवानंद को 16 दिनों तक पोषण पुनर्वास केंद्र में रखा गया। इस बीच 300 ग्राम वजन बढ़ गया, लेकिन शारीरिक विकास की समस्या बनी रही। डेढ़ वर्ष की उम्र तक बैठ नहीं सका। अब बैठना शुरू किया है। अब वजन चार किलोग्राम है। लंबाई 65 सेंटीमीटर है।


इसी विकास खंड के लहरौली गांव की रहने वाली मारिया की बेटी एक साल छह माह की है। उसकी लंबाई 75 सेंटीमीटर और वजन चार किलो 800 ग्राम है। मारिया के मुताबिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मदद से बिटिया को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया है। जन्म के समय बिटिया का वजन ढाई किलोग्राम था। अचानक छह माह बाद वजन घटने लगा।

मुख्यालय से सटे बालूशासन गांव के उमेश की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है। उमेश का बेटा अभिषेक चार साल का हो गया है। जन्म के समय वह बिल्कुल स्वस्थ्य था, लेकिन एक साल बाद भी वजन नहीं बढ़ा। औसतन लंबाई भी नहीं बढ़ सकी। चार साल बाद बेटे का वजन 12 किलो 200 ग्राम है जबकि लंबाई 100 सेंटीमीटर के आसपास है। खास बात यह है कि अभिषेक की दादी खुद आंगनबाड़ी सहायिका हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि गांव में अन्य कुपोषित बच्चों की स्थिति कैसी होगी।

बच्चों की लंबाई और वजन उम्र के हिसाब से कम

बालूशासन गांव के रहने वाले राजेश की डेढ़ साल की बेटी आंचल - फोटो : अमर उजाला
बालूशासन गांव के रहने वाले राजेश की डेढ़ साल की बेटी आंचल का वजन छह किलोग्राम और लंबाई 75 सेंटीमीटर है। यह व्यथा कुछ परिवारों की है। तमाम परिवार ऐसे हैं, जिनके बेटे और बेटियों की लंबाई और वजन उम्र के हिसाब से कम है। इसके बावजूद वह एनआरसी व आंगनबाड़ी केंद्रों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। नतीजा है कि जिले में कुपोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

जन्म के समय वजन ठीक मिल रहा
जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड और पोषण पुर्नवास केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार के मुताबिक पोषण पुर्नवास केंद्र में इस साल अब तक 73 बच्चों का इलाज किया गया है। जन्म के समय इन बच्चों का वजन बेहतर मिला, लेकिन जन्म के छह माह बाद वजन और लंबाई में अचानक कमी आ गई है। शारीरिक विकास सामान्य नहीं रहा। इसी वजह से बच्चे कुपोषित व अतिकुपोषित की श्रेणी में आ रहे हैं।  ऐसा नहीं है कि सिर्फ आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे ही कुपोषण के शिकार हुए हैं। आर्थिक रूप से मजबूत परिवार के बच्चे भी आ रहे हैं।


वजन न बढ़ना बड़ी समस्या
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश गुप्ता के मुताबिक बच्चों का वजन न बढ़ना बड़ी समस्या है। अब जरूरत समय पर जांच और बच्चों के खानपान में सुधार की है, तभी नतीजा सकारात्मक आएगा। रही बात लंबाई की तो कई बार मां और पिता के अनुवांशिक लक्षणों का असर पड़ता है। अगर बच्चा डेढ़ साल का है तो औसतन उसकी लंबाई 80 सेंटीमीटर होनी चाहिए। वजन भी 10 किलोग्राम होना चाहिए।

पंजीरी तो पशुओं को खिलाया जाता है

बुड़ियापार गांव की रहने वाली संजू का डेढ़ साल का बेटा देवानंद - फोटो : अमर उजाला
कोरोना महामारी के बीच कुपोषण की जंग कमजोर पड़ गई है। लहरौली गांव की संजू का कहना है कि बेटा कुपोषण का शिकार है। पिछले छह महीने से पोषक तत्वों से भरपूर पंजीरी नहीं मिली है। दूसरी सुविधाएं मिलने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

बेलवनिया की चांद तारा का कहना है कि कोरोना महामारी ने सब कुछ बदल दिया है। कुपोषित बच्चों की हालत और बिगड़ गई है। पिछले छह महीने में बमुश्किल दो बार पंजीरी मिली है। कई ऐसे मौके आए हैं, जब पंजीरी पशुओं की नाद (जिसमें चारा खाते हैं) में मिली है। राशन मिलता है, उसी से गुजारा होता है। बेटे के स्वास्थ्य पर खुद ही निगाह बनाए रखना पड़ता है।


बेहतर देखरेख के बाद भी नहीं सुधरी स्थिति
पोषण पुनर्वास केंद्र पर कई ऐसे मासूम भी हैं, जिनके वजन और लंबाई में कोई सुधार नहीं हुआ है। ऐसे बच्चों की संख्या 10 के आसपास है। दावा है कि बेहतर देखरेख के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ है। हर 15 दिन में वजन जांचा जाता है। डॉ. सुनील कुमार के मुताबिक एक कुपोषित बच्चे का चार बार फालोअप होता है। हर 15 दिन बाद बच्चे को बुलाया जाता है। 15 दिनों तक केंद्र में रखा जाता है। केंद्र में वजन बढ़ता है, लेकिन घर जाते ही मामला जस का तस हो जाता है। इसकी प्रमुख वजह संतुलित आहार का न मिल पाना है। अगर संतुलित आहार की व्यवस्था हो जाए तो जिले को कुपोषण से आजादी मिल जाएगी।

आंकड़े एक नजर में

बालूशासन गांव के उमेश का बेटा अभिषेक - फोटो : अमर उजाला
कुपोषित बच्चों की संख्या- 8,016
अति कुपोषित बच्चों की संख्या-2,580
2019 में पोषण पुनर्वास केंद्र जाकर इलाज कराने वाले बच्चों की संख्या-159
इस साल (2020) दिसंबर माह तक इलाज कराने वाले बच्चों की संख्या-73

संत कबीर नगर के जिला कार्यक्रम अधिकारी विजय श्री का कहना है कि 'कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों को शासन की तरफ से हर सुविधाएं दी जा रही हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की मदद से बच्चों को पोषण पुर्नवास केंद्र में भर्ती कराया जाता है। कुछ परिवार ऐसे हैं, जो बच्चों को लेकर केंद्र नहीं आना चाहते हैं। इसकी प्रमुख वजह जागरूकता का आभाव है। घरों पर ही संतुलित आहार दिया जाए तो बच्चों को कुपोषण से बचाया जा सकता है। इस सिलसिले में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।'
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