रावण तो बना ही लेते हैं हुजूर। पहले दादा बनाते थे। पिताजी ने भी बनाया, अब हमारा परिवार बना रहा है। लेकिन दुआ कीजिए कि हम अमन के पहरेदार बना सकें। मुल्क से आतंक खत्म करने वाले सिपाही बना सकें। सच्ची कारीगरी तो वही है। दिल की यह बात की वर्षों से रावण का पुतला बनाने वालों ने। भरतपुर गेट मथुरा निवासी रईस का कुनबा वर्षों से रावण का पुतला बना रहा है। रईस के दादा अलीबक्स और पिता मुगल भी मथुरा और आसपास के जनपदों में जाकर रावण का पुतला बनाते थे।
अब रईस के परिवार वाले और रिश्तेदार आगरा, सूरत, कोटा, अजमेर, फरीदाबाद, उदयपुर, जोतपुर, जयपुर, दिल्ली और मुंबई में जाकर पुतला बनाते हैं। बड़े पुतलों के साथ छोटे-छोटे पुतले भी यह लोग तैयार करते हैं। इन पुतलों को कालोनी और मुहल्ले वाले खरीदकर ले जाते हैं। साठ वर्षीय रईस का कहना है कि पंद्रह दिन के भीतर वह रावण का पुतला बना लेते हैं। कई कारीगरों को इसमें लगाया जाता है। दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के वक्त वह मैदान पर ही रहते हैं।
रईस ने कहा कि बड़ी बात तो तब है जब हमारे हाथ से अमन के पहरेदार तैयार हों। ऐसे पहरेदार जो देश भर से नफरत और दुश्मनी को खत्म कर दें। हर तरफ भाईचारा हो। प्यार और मोहब्बत फैले। रावण की ही तरह आतंकवाद खत्म हो जाए। रावण का पुतला बनाने वाले जाहिद और शाहिद ने बताया कि एक महीने पहले पुतला बनाने का सामान इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं।