मेजर ध्यान चंद स्टेडियम का टेनिस कोर्ट।
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मेजर ध्यान चंद स्टेडियम में विश्व स्तरीय लांग 5 टेनिस कोर्ट हैं। इनका निर्माण 2016 में हुआ था, लेकिन अब इनकी दशा खराब है। कोर्ट की दयनीय दशा पर प्रशासक दिलीप सिंह ने एक सप्ताह का समय मांगा है। दिलीप सिंह ने भरोसा दिया है कि वह यहां की व्यवस्था को सुचारु, सुंदर और खिलाडियों के योग्य बना लेंगे। अमर उजाला को उन्होंने बताया कि मंत्री का कार्यक्रम था, इसके अलावा 11-12 दिसंबर को इंटर पार्लियामेंट क्रिकेट टूर्नामेंट भी हुआ और उसके चलते इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा सका।
....लेकिन कहानी कुछ और है। बीएचयू से पढ़े लिखे दिलीप सिंह इस मामले पर आखिर खुलकर कैसे बोल सकते हैं। इस स्टेडियम में खेल संसाधन के रख-रखाव के लिए गवर्निंग बॉडी ने पब्लिक-प्राइवेट मॉडल को अपनाने का निर्णय ले लिया। कोई पूछने पर यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि यह निर्णय कब लिया गया। कुरेदने पर बताते हैं कि यह निर्णय 2-3 साल पहले लिया गया था। अब इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल(आरएफपी) जारी हो गई है। यह अंतिम चरण में है। लेकिन स्टेडियम और टेनिस कोर्ट आदि के रख-रखाव का काम अधर में लटका हुआ है। बताते हैं इसमें 6-7 लाख रुपये का खर्च आएगा, लेकिन अधिकारी व्यवस्थापक सब हाथ पर हाथ धर बैठे हुए हैं। अंदरखाने में सवाल उठा दिया जाता है कि जब पब्लिक-प्राइवेट मॉडल पर जा रहे हैं तो यह खर्च क्यों किया जाए?
क्या होना चाहिए?
टेनिस कोर्ट पर रेड सैंड कम है। स्टैंडर्ड को ध्यान में रखकर सैंड पड़नी चाहिए। इसके अलावा, वहां कोच भी नहीं है। मैदान कर्मी और अन्य सुविधाएं भी होनी चाहिए। परमानेंट मार्किंग टेप ग्राऊंड पर स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। ग्राऊंड मैन के तौर पर जगदीश नाम के व्यक्ति की ड्यूटी है। इस मामले में भी सुधार होना चाहिए। दिलीप सिंह मानते हैं कि जब तक यह सब व्यवस्थाएं सुचारु नहीं होंगे खिलाड़ी अभ्यास के लिए क्यों आएंगे? वह मानते हैं कि स्टेडियम में 50 के करीब खिलाड़ी पंजीकृत हैं। वह जब इधर से गुजरते हैं तो चंद्रभूषण समेत 7-8 लोग खेलते मिलते हैं। सुबह-शाम को जोड़ लें तो 20-25 लोग खेलने आते हैं। जबकि सच्चाई इससे भी उलट है। यह संख्या भी काफी कम है।
अभी कैसे चल रहा है काम?
सीधी सी बात है कि टेनिस कोर्ट दुर्दशा और आधार भूत संसाधन को बनाए रखने के अभाव में है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को अभी तक अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। ऐसे में स्टेडियम के व्यवस्थापक सीपीडब्ल्यूडी से व्यस्थित करने का आग्रह कर लेते हैं। काम चलाऊ तरीके से कोर्ट, ग्राऊंड तैयार हो जाते हैं। मैकेनिकल और इलेकि्ट्रकल रोलर भी हैं, लेकिन उसे आपरेट करने के लिए लोगों का आभाव है। इसका सीधा असर खेलो इंडिया से जुड़े खिलाडि़यों पर पड़ रहा है।