इस अध्ययन में शामिल बंदरों में से केवल एक में एंटीबॉडी का स्तर उस सीमा तक पहुंचा, जिसे संक्रमण से सुरक्षा देने वाला माना जाता है। वहीं 44% बंदरों में ही रक्त में एचआईवी को निष्क्रिय करने वाले एंटीबॉडी विकसित हुए। वैज्ञानिकों का कहना है कि शोध की असली उपलब्धि परिणाम नहीं, बल्कि वह नई तकनीक है जिसके जरिये यह हासिल किया गया। एचआईवी दुनिया के सबसे जटिल वायरसों में से एक है। इसके तीन बड़े कारण हैं।
एचआईवी वैक्सीन की खोज में वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन में पहली बार वैज्ञानिकों ने सामान्य इम्यून सिस्टम वाले बंदरों में ऐसे एंटीबॉडी विकसित करने में सफलता हासिल की है, जो एचआईवी वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि यह सफलता अभी सीमित है और इसे एचआईवी वैक्सीन का अंतिम समाधान नहीं माना जा रहा। हालांकि विशेषज्ञ इसे पिछले कई दशकों में हुई सबसे महत्वपूर्ण प्रगति में से एक बता रहे हैं।
पहला यह कि वायरस अपने ऊपर शर्करा (ग्लाइकेन) की एक परत चढ़ा लेता है, जिससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसे आसानी से पहचान नहीं पाती। दूसरा यह बहुत तेजी से म्यूटेट (रूप बदलता) करता है और तीसरा यह कि शरीर में प्रवेश करने के बाद इसकी संरचना लगातार बदलती रहती है। इन्हीं वजहों से पिछले 40 वर्षों में एचआईवी वैक्सीन के लगभग सभी बड़े प्रयास विफल रहे हैं। 2009 में थाईलैंड में परीक्षण की गई आरवी144 वैक्सीन संक्रमण के जोखिम को केवल 31 फीसदी तक कम कर सकी थी। इसके बाद मेर्क की स्टेप वैक्सीन, दक्षिण अफ्रीका की एचवीटीएन-702 व इंबोकोडो व मोसिको जैसी परियोजनाएं प्रभावी साबित नहीं हो सकीं।
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तीन चरणों में तैयार: वैज्ञानिकों ने इस वैक्सीन को तीन चरणों में विकसित किया। इसमें प्राइमिंग, बूस्टिंग व पॉलिशिंग शामिल है। मतलब सबसे पहले शरीर में मौजूद बेहद दुर्लभ बी-कोशिकाओं की पहचान की गई, जिनमें एचआईवी से लड़ने वाले एंटीबॉडी बनने की क्षमता थी। इसके बाद कई चरणों में ऐसे इंजेक्शन दिए गए, जिनमें एचआईवी की संरचना के अधिक वास्तविक रूप दिखाए गए। इससे बी-कोशिकाएं धीरे-धीरे वायरस को पहचानने में बेहतर होती गईं। अंतिम चरण में एंटीबॉडी को इस स्तर तक विकसित करने की कोशिश की गई कि वे एचआईवी के कई अलग-अलग प्रकारों को निष्क्रिय कर सकें।
नतीजे कितने सफल हैं?
इस अध्ययन में दो तरह के परिणाम सामने आए। आधे से ज्यादा बंदरों में प्रतिरक्षा कोशिकाएं सही दिशा में विकसित हुईं। 44 फीसदी बंदरों में रक्त में एचआईवी को निष्क्रिय करने वाले एंटीबॉडी पाए गए। केवल एक बंदर में एंटीबॉडी का स्तर उस सीमा तक पहुंचा। जिसे वैज्ञानिक संक्रमण से सुरक्षा देने वाला मानते हैं। इस वैक्सीन के शुरुआती हिस्से का परीक्षण इंसानों में पहले ही किया जा चुका है।
अमेरिका में एचवीटीएन-144 ट्रायल में यह देखा गया कि क्या वैक्सीन सही बी-कोशिकाओं को सक्रिय कर सकती है। परिणाम सकारात्मक रहे। इसके बाद दिसंबर 2025 में शुरू हुए आईएवीआई जी004 ट्रायल में मॉर्डना की एमआरएनए तकनीक का उपयोग करते हुए अगले चरण की जांच की जा रही है। हालांकि बंदरों पर इस्तेमाल की गई पूरी तीन-चरणीय वैक्सीन का मानव परीक्षण अभी शुरू नहीं हुआ है।