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महाराष्ट्रः क्या इस दलित हिंसा की जड़ें गुजरात में हैं?

Wed, 03 Jan 2018 08:53 PM IST
अतुल सिन्हा/नई दिल्ली
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- फोटो : PTI
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पुणे से भड़की दलित हिंसा की लपटें क्या गुजरात से आई हैं? क्या इसके पीछे जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद का वो भाषण है जो उन्होंने 31 दिसंबर को पुणे के शनिवार वाडा में आयोजित एल्गार परिषद के कार्यक्रम में दिया था? इन भाषणों में जिस ‘नव पेशवाई’ को खत्म करने, भाजपा और संघ को ‘नव पेशवाई’ का प्रतीक बताने और 2019 में भाजपा को ‘डबल डिजिट’ में ले आने का जो ऐलान किया गया, क्या इस हिंसा की जड़ें वहां हैं?

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दरअसल दो सौ साल पहले 1818 में जिस भीमा कोरेगांव युद्ध में पेशवाओं की हार का शौर्य दिवस मनाया जा रहा था, उसे आज के संदर्भों में जोड़कर एक राजनीतिक लड़ाई का रूप दे दिया गया। महाराष्ट्र हमेशा से दलितों की राजनीति का एक बड़ा केन्द्र रहा है। यहां बाबा साहब अम्बेडकर से लेकर शिवाजी और ज्योतिबा फूले जैसी शख्सियतों का एक ऐसा इतिहास है जिस पर देश की सियासत के कई अध्याय लिखे जा चुके हैं। लेकिन हर बार दलित खुद को ठगा महसूस करते रहे हैं और दलितों पर राजनीति करने वाली पार्टियां अपनी चुनावी रोटियां सेंकती रही हैं।

लेकिन इस बार तस्वीर बदली बदली सी है। खासकर भाजपा शासित राज्यों में एक बार फिर से जो दलित उभार दिख रहा है, ये उसी का नया संस्करण है। गुजरात में युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी को भाजपा पूरा ज़ोर लगाकर भी हरा नहीं पाई और जिस तरह जिग्नेश अपने भाषणों में मोदी, अमित शाह, भाजपा और संघ को खुली चुनौती दे रहे हैं और ये दावा कर रहे हैं कि आने वाले सभी चुनावों में किसी भी हालत में भाजपा को हराना है, इस नए हिंसक आंदोलन के पीछे ये एक बड़ी वजह दिखती है।

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भाजपा के लिए चुनौती बन चुकी है गुजरात की तिगड़ी

कांग्रेस के लिए बेशक गुजरात का अनुभव नया उत्साह लेकर आया है। भले ही वहां कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई लेकिन जिग्नेश, अल्पेश और हार्दिक के साथ गठजोड़ का फार्मूला फेल नहीं हुआ। इन युवा नेताओं में जो एक आत्मविश्वास दिख रहा है, उसे इनके भाषणों में सुना और महसूस किया जा सकता है। मोदी, अमित शाह, योगी और भाजपा के कुछ और मुखर नेताओं के भाषणों में जो दम होता है, एक चुनौती भरा आत्मविश्वास होता है, काफी हद तक इन युवा नेताओं में वही अंदाज़ नज़र आ रहा है। बेशक राहुल गांधी के भीतर वो तेवर न हो, लेकिन कांग्रेस को लगातार ऐसे चेहरों और नेताओं की तलाश रही है जो कम से कम मंच पर भाजपा नेताओं का बराबरी से मुकाबला कर सकें। गुजरात ने कांग्रेस को ये तोहफा तो दिया ही है।

पुणे में इन नेताओं के भाषणों को अगर सुनिए तो साफ हो जाता है कि प्रशासन और इंटेलिजेंस को इसकी रिपोर्ट पहले से थी। एल्गार परिषद ने बाकायदा इजाजत लेकर ये कार्यक्रम आयोजित किया था और उसमें उमर खालिद और जिग्नेश मेवाणी के अलावा 10 से ज्यादा दलित-मुस्लिम नेताओं के पोस्टर लगाए गए थे। भाषणों पर गौर करें तो किसी भी लोकतांत्रिक देश में ऐसे भाषण दिए जाते रहे हैं। भाजपा अगर कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के लिए कांग्रेस का सफाया कर देने की बात कर सकती है तो विपक्ष या विरोधियों का ऐसा तेवर आश्चर्य नहीं पैदा करता।

लेकिन गौर करने की बात ये है कि गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा सरकार को जिस तरह समय समय पर दलितों का विरोध झेलना पड़ रहा है और जिस तरह यह मामला हिंसक होने के साथ साथ तमाम पुराने मामलों के साथ जुड़ता जा रहा है, वह गंभीर संकेत दे रहा है। इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले आम चुनावों तक ये नए समीकरण क्या गुल खिलाएंगे, देखने वाली बात होगी।
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