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Maharashtra Politics: ठाकरे की विरासत नहीं संभाल पाए उद्धव, तीन दिवसीय ‘शिव संवाद यात्रा’ पर आदित्य ठाकरे

Fri, 22 Jul 2022 05:45 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई।

सार

पिछले महीने शिवसेना विधायक दल में विभाजन के चलते उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। सत्ता से बेदखल होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट से लगातार झटके मिल रहे है। मंगलवार को शिवसेना के 19 में से 12 सांसद शिंदे खेमें में शामिल हो गए।
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पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे। - फोटो : ANI
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विस्तार
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शिवसेना के विधायकों के बाद अब सांसदों पर से भी पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने नियंत्रण खो दिया है। शिवसेना की मौजूदा स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारे में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या शिवसेना संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे की विरासत खत्म होने की कगार पर है। वहीं पार्टी के युवा नेता आदित्य ठाकरे बृहस्पतिवार को तीन दिनों के लिए शिव संवाद यात्रा पर निकले। आदित्य ने कहा, वे नए सिरे से शिवसेना को संगठित करने ठाणे, नासिक और औरंगाबाद के तीन दिवसीय यात्रा पर निकले हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर हमला बोलते हुए कहा, शिंदे के नेतृत्व में बनी सरकार अवैध है और वह ज्यादा दिन तक नहीं चलेगी।

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पिछले महीने शिवसेना विधायक दल में विभाजन के चलते उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। सत्ता से बेदखल होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट से लगातार झटके मिल रहे है। मंगलवार को शिवसेना के 19 में से 12 सांसद शिंदे खेमें में शामिल हो गए। सांसदों के उद्धव से अलग होने के बाद से ठाकरे की विरासत पर सवाल उठने लगे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उद्धव ठाकरे (61) अपने पिता दिवंगत बाल ठाकरे की विरासत को भुना नहीं पाए। अब शिवसेना में ऊपर से नीचे तक विभाजन अपरिहार्य है। एक राजनीतिक विश्लेषक का दावा है कि ठाकरे की विरासत उनके गुट में बनी रहेगी लेकिन एकछत्र स्वामित्व नहीं रहेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शिवसेना सिर्फ कागजों पर ही रह जाएगी या उसे जनता का समर्थन भी मिलेगा। फिलहाल, उद्धव खुद अपने भविष्य को लेकर उलझन में हैं।
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बाल ठाकरे और उद्धव के बीच है बुनियादी अंतर
दिवंगत बाल ठाकरे ने साल 1966 में शिवसेना का गठन किया था। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे और उनके पुत्र उद्धव ठाकरे के बीच एक बुनियादी अंतर है। राजनीतिक पर्यवेक्षक बताते हैं कि उन्होंने पुत्र उद्धव ठाकरे को अपनी विरासत सौंपी थी। सहज ही शिवसेना की कमान मिलने के बाद उद्धव ने अपना नेतृत्व स्थापित करने के लिए कोई बहुत प्रयास नहीं किया। उद्धव ने हर चीज को हल्के में लिया। शिंदे की सरकार बनने के बाद मनसे  अध्यक्ष राज ठाकरे ने तंज कसा था कि किस्मत से मिली चीज को जब व्यक्ति अपनी उपलब्धि मान लेता है तो उसका पतन शुरू हो जाता है।

राणे और राज के बाद शिंदे ने दिया झटका
90 के दशक में शिवसेना में छगन भुजबल ने बगावत की थी। अब वे एनसीपी सुप्रीमों शरद पवार के साथ हैं। उसके बाद साल 2003 में शिवसेना की कमान संभालने के करीब एक महीने बाद उद्धव ठाकरे को सबसे पहले मौजूदा केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने जोर का झटका दिया था। उसके बाद उनके चचेरे भाई राज ठाकरे शिवसेना से अलग हुए। चूंकि उस समय बाल ठाकरे जीवित थे इसलिए शिवसेना इस बगावत से उबर गई।

हिम्मत है तो इस्तीफा देकर चुनाव का सामना करें शिंदे
आदित्य ने बागी विधायकों को चुनौती दी कि हिम्मत है तो इस्तीफा देकर फिर से चुनाव का सामना करें। दरअसल, एकनाथ शिंदे के विद्रोह के चलते उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। शिवसेना के 55 में से 40 विधायकों के शिंदे गुट में शामिल होने के बाद 19 में से 12 सांसदों ने भी उद्धव का साथ छोड़ दिया है। इसके साथ ही शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट ने निर्वाचन आयोग में पत्र लिखकर पार्टी का चुनाव चिह्ल धनुष-बाण पर भी दावा ठोंका है।

बागी विधायक शिवसैनिक नहीं गद्दार हैं
आदित्य ठाकरे ने कहा, एकनाथ शिंदे ने तब विद्रोह किया जब मेरे पिता उद्धव ठाकरे बीमार थे। उन्हें एमवीए सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया लेकिन उन्होंने धोखा दिया और हमें छोड़ दिया। वे शिवसैनिक नहीं गद्दार हैं।

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