महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार की सुबह आए उलटफेर ने उद्धव ठाकरे जैसों की सांसें अटका दीं तो अब तक शांत रहने वाली भाजपा ने यह बता दिया कि राजनीति की शतरंज पर बाजी किस तरह पलटी जाती है। सुबह देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद लग रहा था कि अब महाराष्ट्र रकी राजनीति में कुछ ठहराव आएगा, लेकिन विपक्षी दलों का सुप्रीम कोर्ट के पास जाना और शरद पवार के रुख ने यह तय कर दिया कि महाराष्ट्र की महाभारत अभी शांत नहीं हुई है।
पहला, ईडी-सीबीआई का डर। 25 हजार करोड़ केसहकारी बैंक घोटाले में मुंबई हाईकोर्ट केनिर्देश पर अगस्त में ही मुकदमा दर्ज हुआ है। 70 हजार करोड़ केसिंचाई घोटाले में भी वे घिरे हैं। दूसरा कारण, पवार परिवार की अंदरूनी राजनीति और पवार की बेटी सुप्रिया सुले से उनकी अदावत। सुप्रिया केराजनीति में आने से पहले तक अजित को शरद पवार का स्वाभाविक उत्तराधि
जानकारों की दो राय है। पहली, अजित ने बगावत की है। दूसरी राय रखने वाले संजय राउत केबयान का उल्लेख करते हैं कि पवार को समझने केलिए दस जन्म लेने होंगे। इस राय वाले मानते हैं कि इस खेल की पटकथा पीएम नरेंद्र मोदी केसाथ पवार की मुलाकात में रख दी गई थी। 40 मिनट महज किसानों पर मुद्दे पर तो बात नहीं हुई होगी। साथ ही, बीच मुलाकात पीएम ने गृहमंत्री अमित शाह व वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को वैसे ही नहीं बुलाया होगा। यह स्थापित मान्यता है कि शरद पवार के बिना अजित एक कदम भी नहीं रखते हैं।
भाजपा केपास अभी अपने व निर्दल मिलाकर 120 विधायक हैं? बहुमत का आंकड़ा 145 है। दल-बदल कानून से बचने केलिए अजित को एनसीपी के कुल 54 विधायकों में से दो तिहाई यानी 36 विधायकोंका समर्थन चाहिए। चर्चा है कि अजित केपास 35 हैं। शनिवार सुबह 11 विधायक अजित के साथ गए थे, उनमें से सात शरद केपास लौट आए थे। वैसे शाम की एनसीपी की बैठक में 43 विधायक थे। इनमें पटकथा के मास्टरमाइंड माने जा रहे धनंजय मुंडे भी थे।
पहला विकल्प, पवार अपने विधायकों को किसी भी तरह मनाएं और भाजपा को किसी भी हाल में बहुमत न साबित करने दें। दूसरा, एनडीए में शामिल हो जाएं, बेटी सुप्रिया केंद्र में मंत्री बन जाएं। वैसे दो साल पहले भाजपा शिवसेना ने नाता छोड़ने की शर्त मान लेती, तो एनसीपी आज एनडीए में ही होती।
सरकार बनाने केलिए साथ आने से कांग्रेस-शिवसेना एक तरह से एक्सपोज हो गए थे। भाजपा हमलावर हो सकेगी कि कांग्रेस की न तो धर्मनिरपेक्षता असली है, न शिवसेना का हिन्दुत्व। दोनों सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं। तीस तारीख को विश्वास मत तक फिलहाल शिवसेना, कांग्रेस व एनसीपी का साथ रहने का एलान कर चुके हैं। इसके बाद ही भविष्य तय होगा।