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Maharashtra political crisis: उद्धव और शिंदे समूहों द्वारा दायर याचिकाओं पर 29 को सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Wed, 02 Nov 2022 03:46 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के वकीलों ने इस बात पर सहमति जताई है कि वे संविधान पीठ के समक्ष विचार करने और इस संदर्भ पर निर्णय लेने के लिए उठने वाले मुद्दों को लेकर कि वे मिलेंगे और इसे तैयार करेंगे। निर्देश के लिए मामले को 29 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुटों द्वारा महाराष्ट्र राजनीतिक संकट को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 29 नवंबर को सुनवाई करेगा। उस दिन शीर्ष अदालत की ओर से कुछ दिशा-निर्देश जारी करने की संभावना है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एमआर शाह, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी, न्यायमूर्ति हेमा कोहली और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पांच सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को दोनों पक्षों से लिखित दलीलें और मुद्दों पर एक संयुक्त संकलन दाखिल करने को कहा, जिस पर संविधान पीठ फैसला करेगी।

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पीठ ने कहा कि "दोनों पक्षों के वकीलों ने इस बात पर सहमति जताई है कि वे संविधान पीठ के समक्ष विचार करने और इस संदर्भ पर निर्णय लेने के लिए उठने वाले मुद्दों को लेकर कि वे मिलेंगे और इसे तैयार करेंगे। निर्देश के लिए मामले को 29 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया गया है।"


23 अगस्त को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कानून से संबंधित कई प्रश्न तैयार किए थे और पांच-न्यायाधीशों की पीठ को दल-बदल, विलय और अयोग्यता से संबंधित कई संवैधानिक प्रश्न उठाने वाले गुटों द्वारा दायर याचिकाओं को सुनने के लिए भेजा था। शीर्ष अदालत ने संविधान पीठ के समक्ष याचिकाओं को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया था और चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह शिंदे गुट की याचिका पर कोई आदेश पारित न करे कि उसे असली शिवसेना माना जाए और उसे पार्टी का चुनाव चिन्ह दिया जाए। कोर्ट ने कहा था कि दोनों गुट की याचिकाओं में अयोग्यता, स्पीकर और राज्यपाल की शक्ति और न्यायिक समीक्षा को लेकर संविधान की 10वीं अनुसूची से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों को उठाया है।

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शीर्ष अदालत ने कहा कि 10वीं अनुसूची से संबंधित नबाम रेबिया मामले में संविधान पीठ द्वारा निर्धारित कानून का प्रस्ताव एक विरोधाभासी तर्क पर आधारित है जिसमें संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखने के लिए अंतराल को भरने की आवश्यकता है। अदालत ने संविधान पीठ से संवैधानिक मुद्दों पर गौर करने को कहा था कि क्या स्पीकर को हटाने का नोटिस उन्हें अयोग्यता की कार्यवाही जारी रखने से रोकता है, क्या अनुच्छेद 32 या 226 के तहत याचिका अयोग्यता कार्यवाही के खिलाफ है, क्या कोई अदालत यह मान सकती है कि किसी सदस्य को उसके कार्यों के आधार पर अयोग्य घोषित किया गया है, सदस्यों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं लंबित सदन में कार्यवाही की स्थिति क्या है।


संविधान की दसवीं अनुसूची में निर्वाचित और मनोनीत सदस्यों को उनके राजनीतिक दल से दलबदल रोकने का प्रावधान है और दलबदल के खिलाफ कड़े प्रावधान शामिल हैं। शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट ने पहले दायर याचिका में कहा था कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के प्रति वफादार पार्टी विधायक किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय करके ही संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से खुद को बचा सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने शिंदे गुट से ठाकरे खेमे द्वारा दायर याचिकाओं में उठाए गए विभाजन, विलय, दलबदल और अयोग्यता के कानूनी मुद्दों पर फिर से विचार करने के लिए कहा था। इसपर शिंदे गुट ने कहा था कि दलबदल विरोधी कानून उस नेता के लिए हथियार नहीं है, जिसने अपने सदस्यों को बांध कर रखने और किसी तरह सत्ता में बने रहने के लिए अपनी ही पार्टी का विश्वास खो दिया है।

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