सूत्र बताते हैं कि इस मामले में आरोपियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाना था। इस बाबत कई बार नोटिस तैयार किया गया, लेकिन अंतिम क्षणों में उसे रोक लिया जाता। इसकी वजह कुछ कानूनी पहलू बताए गए, लेकिन सूत्रों की मानें तो यह सब कथित तौर पर केंद्र के इशारे पर हो रहा था।
ईडी ने जो मामला दर्ज किया था, उसके अन्य आरोपियों में दिलीप राव देशमुख, इशरलाल जैन, जयंत पाटिल, शिवाजी राव, आनंद राव अडसुल, राजेंद्र शिंगाने और मदन पाटिल शामिल हैं। खास बात है कि मुंबई पुलिस ने हाईकोर्ट के निर्देश पर एमएससीबी घोटाला मामले में अजित पवार और अन्य पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।
2007 और 2011 के बीच कथित रूप से एमएससीबी को 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान पहुंचाने की बात भी सामने आई थी।
अजित पवार और दूसरे आरोपियों के बारे में कहा गया कि उन्होंने सहकारी चीनी कारखानों के लिए ऋण संवितरण में अनियमितताएं बरती थीं। नियमों के खिलाफ जाकर ऋण स्वीकृत किए गए थे। कई मामलों में तो ऋण देने के लिए बतौर जमानत कुछ नहीं लिया गया।
बाद में सहकारी चीनी कारखानों को कथित तौर पर कुछ नेताओं के करीबी रिश्तेदारों को बेच दिया गया था। जांच एजेंसियों के मुताबिक, अजित पवार के खिलाफ मामला आगे ले जाने के लिए पर्याप्त सबूत थे। वजह, वे खुद बैंक के निदेशक रहे हैं। जांच एजेंसी उन्हें कभी भी हिरासत में ले सकती थी।
नाबार्ड की ऑडिट रिपोर्ट में भी चीनी कारखानों और कताई मिलों के ऋण वितरण में आरोपियों द्वारा कई बैंकिंग कानूनों व आरबीआई के दिशानिर्देशों के उल्लंघन का जिक्र है। स्थानीय कार्यकर्ता सुरिंदर अरोड़ा ने 2015 में ईओडब्ल्यू के साथ मिलकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।उसके बाद ही आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकी थी।
ईडी ने जब मामला दर्ज किया तो फौरी तौर पर शरद पवार ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि मामला राज्य सरकार ने दायर किया है या ईडी ने। हालांकि बाद में उन्होंने कहा, वे खुद ईडी के दफ्तर में जाकर इस मामले की जानकारी देंगे।
उधर, कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि ये भाजपा की पुरानी आदत है। वह जांच एजेंसियों के दम पर पहले भी कई राज्यों में सरकार बना चुकी है। महाराष्ट्र के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। ईडी या सीबीआई, कब किसे अपने पास बुला ले, कोई नहीं जानता।