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महाराष्ट्र : मुसीबत बन रहे 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट', पहले शह से बढ़ाते हैं कद, फिर कराते किरकिरी

आशीष तिवारी, अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sun, 21 Mar 2021 09:04 PM IST

सार

विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस महकमे और सरकार की शह पर "वर्दी वाले गुंडे" हो जाते हैं तथाकथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट। एक काम सरकार का और फिर निन्यानवे काम अपने करते हैं ये मुसीबत पैदा करने वाले लोग। 
 
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परमबीर सिंह, पूर्व पुलिस कमिश्नर, मुंबई - फोटो : AM

मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने चिट्ठी लिखकर सचिन वाजे के माध्यम से 100 करोड़ रुपए प्रतिमाह की उगाही की बात लिख कर सरकार, पुलिस महकमे और कुछ "चहेते अफसरों" की सांठगांठ को उजागर कर दिया है। हालांकि पुलिस महकमे से पहले से वाकिफ लोग इस बात से पूरी तरीके से वाकिफ हैं कि एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के माध्यम से न सिर्फ अवैध उगाही होती है, बल्कि राजनैतिक और पुलिस महकमे के प्रश्रय से ये अपना कद बहुत बड़ा कर लेते हैं। इन्हें मीडिया में नायक या सुपरमैन की तरह पेश किया जाता है। इन्हें केंद्रित करके फ़िल्में बनती हैं। आम लोग इन्हें रक्षक की तरह देखने लगते हैं।
 

सियासी व पुलिस संरक्षण से बढ़ाते हैं निजी साम्राज्य

महाराष्ट्र से लेकर देश के कई राज्यों में ऐसे बहुत से एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हैं, जिन्होंने राजनैतिक और पुलिस महकमे के संरक्षण के बाद अपना "निजी साम्राज्य" बढ़ाने में बल मिलता रहा। महाराष्ट्र के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इस मामले में सबसे ज्यादा आगे रहे। 



पकड़े जाने पर बनते हैं पुलिस के गले की फांस
विशेषज्ञों का मानना है पुलिस महकमा और सरकार जब हद से ज्यादा आंखें बंद करके ऐसे पुलिस वालों पर भरोसा करती है तो उसी भरोसे की आड़ में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट न सिर्फ अपनी पूंजी को बढ़ाते हैं, बल्कि अपने बलबूते पर अपना बड़ा आर्थिक साम्राज्य भी खड़ा कर लेते हैं। बाद में पकड़े जाने पर पुलिस के गले की फांस बन जाते हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक वीएन राय कहते हैं दरअसल ऐसे कथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट वर्दी पहने अपराधी होते हैं।

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परमबीर सिंह, पूर्व पुलिस कमिश्नर, मुंबई - फोटो : AM
मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने चिट्ठी लिखकर सचिन वाजे के माध्यम से 100 करोड़ रुपए प्रतिमाह की उगाही की बात लिख कर सरकार, पुलिस महकमे और कुछ "चहेते अफसरों" की सांठगांठ को उजागर कर दिया है। हालांकि पुलिस महकमे से पहले से वाकिफ लोग इस बात से पूरी तरीके से वाकिफ हैं कि एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के माध्यम से न सिर्फ अवैध उगाही होती है, बल्कि राजनैतिक और पुलिस महकमे के प्रश्रय से ये अपना कद बहुत बड़ा कर लेते हैं। इन्हें मीडिया में नायक या सुपरमैन की तरह पेश किया जाता है। इन्हें केंद्रित करके फ़िल्में बनती हैं। आम लोग इन्हें रक्षक की तरह देखने लगते हैं।
 
सियासी व पुलिस संरक्षण से बढ़ाते हैं निजी साम्राज्य
महाराष्ट्र से लेकर देश के कई राज्यों में ऐसे बहुत से एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हैं, जिन्होंने राजनैतिक और पुलिस महकमे के संरक्षण के बाद अपना "निजी साम्राज्य" बढ़ाने में बल मिलता रहा। महाराष्ट्र के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इस मामले में सबसे ज्यादा आगे रहे। 

पकड़े जाने पर बनते हैं पुलिस के गले की फांस
विशेषज्ञों का मानना है पुलिस महकमा और सरकार जब हद से ज्यादा आंखें बंद करके ऐसे पुलिस वालों पर भरोसा करती है तो उसी भरोसे की आड़ में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट न सिर्फ अपनी पूंजी को बढ़ाते हैं, बल्कि अपने बलबूते पर अपना बड़ा आर्थिक साम्राज्य भी खड़ा कर लेते हैं। बाद में पकड़े जाने पर पुलिस के गले की फांस बन जाते हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक वीएन राय कहते हैं दरअसल ऐसे कथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट वर्दी पहने अपराधी होते हैं।

पहले अंडरवर्ल्ड की तोड़ी कमर, बाद में उससे जुड़ गए

90 के दशक में मुंबई में अंडरवर्ल्ड का सिक्का चलता था। अवैध धन उगाही से लेकर स्मगलिंग और बिल्डिंग के कारोबार में जबरदस्त पैसा लगाया जा रहा था। अपार दौलत से लकदक अंडरवर्ल्ड के पूरे तिलिस्म को तोड़ने के लिए पुलिस महकमे और सरकार ने पुलिस विभाग में ऐसी कई यूनिटें स्थापित की, जो अंडरवर्ल्ड की कमर तोड़ के रख दें। 
विशेषज्ञों के मुताबिक इस दौरान ऐसे कई एनकाउंटर स्पेशलिस्ट भी सामने आए जिन्होंने अंडरवर्ल्ड की कमर तोड़ी, लेकिन बाद में अंडरवर्ल्ड के साथ संलिप्त भी हो गए। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कभी किसी गैंग के लिए तो कभी किसी गैंग के लिए अंदरखाने काम तक करने लगे। यही वजह रही कि कई बार कई फर्जी एनकाउंटर किए गए। कई पुलिस अधिकारी इसकी आड़ में जेल तक चले गए। 

कई एनकाउंटर स्पेशलिस्टों ने किया शर्मसार

महाराष्ट्र कैडर के एक पूर्व आईपीएस अधिकारी बताते हैं कि महाराष्ट्र में ऐसे एक नहीं कई एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हुए जिनकी वजह से महकमे को शर्मसार होना पड़ा। वह बताते हैं दरअसल पुलिस महकमे ने शुरुआती दौर में इनको खुली छूट दी और नतीजा हुआ कि बहुत से पुलिस अधिकारी इसका नाजायज फायदा उठाकर ना सिर्फ तथाकथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बन गए बल्कि तमाम व्यवस्था को बायपास करते हुए अपना एकछत्र राज्य चलाने का प्रयास भी करने लगे। 

प्रदीप शर्मा को खाना पड़ी जेल की हवा
उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर पहचाने जाने वाले प्रदीप शर्मा शुरुआती दौर में विवादों में आए। उन पर फर्जी एनकाउंटर के आरोप लगे। वह लखन भैया फर्जी एनकाउंटर और राम नारायण गुप्ता फर्जी एनकाउंटर मामलों में न केवल सस्पेंड हुए बल्कि उनको जेल की हवा तक खानी पड़ी। महाराष्ट्र में ऐसे ही एक अन्य ऑफिसर प्रफुल्ल भोंसले भी रहे। उन पर भी ऐसे ही आरोप लगे। 

बंजारा पर भी फर्जी एनकाउंटर के केस लगे

गुजरात के पूर्व आईपीएस अधिकारी डीजी बंजारा पर भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का तमगा लगा और उन पर भी फर्जी एनकाउंटर के कई मुकदमे लगे। ये मामले बाद में हत्या के केस में तब्दील हुए। 

दिल्ली में एसीपी राजबीर सिंह की हत्या हुई
ऐसे ही दिल्ली पुलिस में अपने एनकाउंटरो की बदौलत महज 13 साल में एसीपी बनाने वाले राजबीर सिंह की 2008 में हत्या हो गई थी। राजबीर सिंह के भी कई एनकाउंटर पर सवाल उठे। उनकी हत्या की वजह प्रॉपर्टी विवाद बताया गया। 

डीजीपी बिक्रम सिंह बोले- एक काम सरकार का, 99 अपने करते हैं

उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार डीजीपी रहे बिक्रम सिंह कहते हैं कि एक तो पुलिस की नियमावली में ये "सुपर कॉप" और "एनकाउंटर स्पेशलिस्ट" जैसे कोई पद नहीं होते हैं। जो पुलिस अधिकारी इस इमेज के साथ सामने आते रहते हैं दरअसल वह हमेशा कानून की परिधि से बाहर जाकर काम करते हैं। ऐसे पुलिस वालों पर अंकुश लगाना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि यह पुलिस वाले अगर एक काम सरकार का करते हैं तो 99 काम अपने करते हैं।

वे सभी 99 काम न सिर्फ अनैतिक होते हैं बल्कि पूरी तरीके से गैरकानूनी होते हैं। विक्रम सिंह कहते हैं ऐसे जितने भी तथाकथित पुलिस वाले खुद को एनकाउंटर स्पेशलिस्ट मानते रहे उनका पूरा का पूरा इतिहास अगर आप उठा कर देखेंगे तो काले अक्षरों में ही लिखा रहा। वह कहते हैं कि आंख बंद करके सरकार का और पुलिस महकमे का भरोसा पाने वाले अन्य अधिकारी हमेशा आंखों में धूल झोंक कर अपने हित ज्यादा साधते रहते हैं।

परमबीर सिंह की भूमिका को भी ठीक नहीं मानते उप्र के पूर्व डीजीपी 

उप्र के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं कि मुंबई में सचिन वाजे के मामले में पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह की भूमिका भी ठीक नहीं रही। परमबीर सिंह को जब इस बात की जानकारी हुई कि सचिन वाजे को 100 करोड़ रुपए महीने की वसूली का लक्ष्य गृहमंत्री ने दिया है तो उनको तत्काल ही महाराष्ट्र के गृहमंत्री के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लेना चाहिए था और सचिन के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर देनी चाहिए थी। 

वाजे की सत्यनिष्ठा पर सवाल जायज
विक्रम सिंह के मुताबिक जो व्यक्ति एक राजनीतिक पार्टी में रहा हो और बाद में वह पुलिस महकमे में आकर एक जिम्मेदार पद पर काम करने लगे ऐसे में उसकी सत्य निष्ठा पर सवाल उठना जायज है। उसको हमेशा संदेह के नजरिये से ही देखा जाएगा, क्योंकि उसकी लॉयल्टी पुलिस महकमे से ज्यादा एक पार्टी के लिए ही होगी। विक्रम सिंह ने कहा कि सचिन किस हैसियत से पुलिस कमिश्नर को रिपोर्ट करते थे, जबकि उनकी रिपोर्टिंग किसी दूसरे अधिकारी के लिए तय की गई थी। यह सारी प्रक्रिया इस बात की गवाही देती है कि बहुत कुछ साफ नहीं था। मिलीभगत हर स्तर पर थी। 
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