कभी तमिल, गुजरती, बिहारी को मुंबई और महाराष्ट्र में बाहरी बता कर वोट बटोरने वाली शिवसेना के सूत्र कहते हैं कि पार्टी समय के साथ खुद को बदल रही है। क्षेत्रीयता अब मुद्दा नहीं रही। यह समय की मांग भी है।
फिर आदित्य के रूप में पहली बार ठाकरे परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में उतर रहा है। यानि तीसरी पीढ़ी तक रिमोट कंट्रोल से पार्टी या सरकार चलाने का दौर भी खत्म हो गया। जानकार मानते हैं कि शिवेसना द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों के खत्म होने से उसकी स्थिति कमजोर हुई है।
भाजपा ने विकास और राष्ट्रीयता की राजनीति से उसका विकल्प भी पेश कर दिया है। ऐसे में शिवसेना को बड़े दायरे में राजनीति करनी होगी। जातीय समीकरणों को भी देखना अब उसकी नई मजबूरी है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदू और मराठा माणुस की राजनीति के साथ भाजपा से गठबंधन में 24 साल में शिवसेना के वोट सिर्फ तीन फीसदी बढ़े हैं। जबकि इस दौरान भाजपा के 16.38 फीसदी वोट बढे। 2019 चुनाव में अब भाजपा सीधे बिग ब्रदर के रोल में हैं। ऐसे में शिवसेना के पास पुराने वोट बैंक को बचाने के साथ नए वोटर जोड़ने की चुनौती है।