संजय राउत शिवसेना के राज्यसभा सांसद हैं, तो वहीं नवाब मलिक एनसीपी के प्रवक्ता और विधायक हैं। जब से महाराष्ट्र का सियासी दंगल शुरु हुआ, तभी से लोगों ने अपने टीवी सेट पर इन दोनों नेताओं को हर एक-दो घंटे में देखा-सुना होगा। ये दोनों ही नेता ऐसे रहे हैं, जिन्होंने खुलकर मीडिया के सवालों का जवाब दिया। सुबह के पांच बजे हों या रात के 12, ये दोनों नेता बयान देने के लिए हमेशा मौजूद रहे। मीडिया के सवालों से कभी भागे नहीं। जब भाजपा-शिवसेना की बातचीत टूटी, तो संजय राउत को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। हालांकि वे दो तीन दिन बाद अपने उसी सुपरमैन वाली भूमिका में मीडिया के सामने आ गए।
नवाब मलिक मूलत: उत्तरप्रदेश से हैं। उनका जन्म 20 जून 1959 में दौसा में हुआ था। उसके बाद 1970 में उनका परिवार मुंबई आ गया। अंजुमन इस्लाम हाई स्कूल के बाद उन्होंने बुरहानी कालेज से इंटर किया और वहीं से बीए की परीक्षा पास की। पढ़ाई के बाद उन्होंने खुद का व्यवसाय शुरू कर दिया। वे 1996, 1999 और 2004 में नेहरू नगर से विधायक चुने गए। 2009 और 2019 में भी वे एनसीपी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे।
उन्हें पार्टी प्रमुख शरद पवार का खासा विश्वस्त माना जाता है। यही कारण रहा कि महाराष्ट्र के सियासी दंगल, जिसमें कई पार्टियां शामिल थीं, उनकी बैठकों को लेकर मीडिया में कब कौन सी जानकारी पहुंचाई जाए, ये जिम्मेदारी शरद पवार ने नवाब मलिक को सौंपी थी और उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।
संजय राउत का जन्म 15 नवंबर 1961 को महाराष्ट्र में हुआ था, वे आरंभ से ही शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के साथ जुड़े रहे। बाद में उन्हें बाला साहेब का विश्वसनीय कहा जाने लगा। वे सामना न्यूजपेपर के कार्यकारी संपादक भी रहे। उन्होंने इसी साल रिलीज हुई 'ठाकरे' बायोग्राफिक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है। संजय को उद्धव ठाकरे का भी विश्वासपात्र माना जाता है। यही वजह है कि पार्टी की बात को मीडिया के समक्ष रखने के लिए उन्हें ही आगे किया जाता रहा है।
अप्रैल 2015 में, उन्होंने वोट बैंक की राजनीति के लिए मुस्लिम समुदाय पर एक विवादित बयान दिया था। शिवसेना के मुखपत्र सामना में उन्होंने एक कॉलम में लिखा कि मुसलमानों को वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में कुछ वर्षों के लिए उनके वोटिंग अधिकार को रद्द कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा, जब तक मुसलमानों को वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तब तक उनका कोई भविष्य नहीं है। वे 2004 में पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए। इसके बाद 2010 में वे दोबारा से राज्यसभा आ गए। 2016 में उन्हें तीसरी बार राज्यसभा के लिए चुना गया।